सरकारी कंपनियों की परिभाषा बदलेगी: 26% हिस्सेदारी पर भी PSU मानी जा सकती है कंपनी
मुंबई- संसद में पेश की गई आर्थिक समीक्षा में एक बड़ा बदलाव सुझाया गया है। सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की परिभाषा बदलनी चाहिए। अब 51% की बजाय सिर्फ 26 फीसदी हिस्सेदारी होने पर भी कंपनी को सरकारी माना जा सकता है। यह बदलाव इसलिए सुझाया गया है क्योंकि 26 फीसदी हिस्सेदारी से भी कंपनी के बड़े फैसलों पर असर डाला जा सकता है।
मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन और उनकी टीम ने यह सिफारिश की है। जिन सरकारी कंपनियों को बेचा जाना है, उनकी कानूनी परिभाषा बदले बिना भी सरकार अपनी हिस्सेदारी 51 फीसदी से कम कर सकती है। इससे कंपनी को पूरी तरह बेचने की राह आसान हो जाएगी। इसके लिए बिक्री पेशकश (ऑफर फॉर सेल) का इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया है। 2016 से अब तक 36 सरकारी कंपनियों को बेचने या निजीकरण करने की मंजूरी मिली है। इनमें से 13 कंपनियों के सौदे पूरे हो चुके हैं। बाकी कंपनियां अभी अलग-अलग चरणों में हैं।
यह भी बताया गया है कि करीब 30 फीसदी ऐसी सरकारी कंपनियां हैं जिनमें सरकार की हिस्सेदारी पहले से ही 60 फीसदी से कम है। अभी कंपनी कानून के मुताबिक, किसी कंपनी को सरकारी कंपनी कहलाने के लिए केंद्र या राज्य सरकार की कम से कम 51 फीसदी हिस्सेदारी होना जरूरी है। यह 51% की सीमा ओएफएस के जरिये और हिस्सेदारी बेचने में रुकावट पैदा करती है। इस नई परिभाषा से सरकार को उन कंपनियों से बाहर निकलने में आसानी होगी जिनमें वह अब और निवेश नहीं करना चाहती।
खजाने को भरने में मिलेगी मदद
यह कदम सरकारी खजाने को भरने और कंपनियों को बेहतर प्रबंधन देने में मदद कर सकता है। उदाहरण के लिए अगर सरकार किसी कंपनी में 51% हिस्सेदारी रखती है और उसे लगता है कि अब वह कंपनी खुद से अच्छा प्रदर्शन कर सकती है तो वह अपनी हिस्सेदारी 26% तक कम कर सकती है। इससे कंपनी पर सरकारी नियंत्रण कम हो जाएगा। लेकिन, महत्वपूर्ण फैसलों पर सरकार का प्रभाव बना रहेगा।

