अमेरिकी टैरिफ में कटौती से उत्तर प्रदेश के कालीन और चमड़ा उद्योग को नई संजीवनी
मुंबई- अमेरिकी टैरिफ में कमी के एलान ने उत्तर प्रदेश के कालीन और चमड़ा उद्योगों को संजीवनी दे दी है। बीते कई महीनों से जहां प्रदेश के कानपुर और आगरा से होने वाला चमड़ा निर्यात खासा घट चुका था वहीं भदोही के कई कालीन कारखानों में तो उत्पादन ही ठप हो गया था। अब भारत-अमेरिका के बीच हुई ट्रेड डील के बाद कालीन व चमड़ा निर्यातकों के बीच खुशी की लहर है।
दरअसल अमेरिकी टैरिफ बढ़कर 50 फीसदी हो जाने के बाद सबसे तगड़ा झटका उत्तर प्रदेश के कालीन उद्योग को लगा था। देश की कालीन बेल्ट कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश के भदोही-मिर्जापुर में हाथ से तैयार होने वाली कालीनों को सबसे बड़ा हिस्सा अमेरिकी बाजारों को जाता था। लगभग एक साल से निर्यात के आर्डर 80 फीसदी तक घट जाने के बाद पूरे इलाके में सन्नाटा पसर चुका था। कारोबारियों ने कारखानों में ताला लगा दिया और कीलन बुनकरों का पलायन होने लगा था। टैरिफ विवाद सुलझ जाने के बाद अब कारोबारियों से लेकर बुनकरों में फिर से आस जगी है।
निर्यातकों के लिए टैरिफ का घटना संजीवनी से कम नहीं है। रोजगार फिर बढ़ेगा और कम से कम 10 लाख लोगों का पलायन रूकेगा। कारोबारियों को आर्डर मिलने शुरू होंगे और जल्द ही धंधा पटरी पर आ जाएगा। भदोही-मिर्जापुर के हाथ की बुनाई वाले कालीनों की मांग अमेरिका-यूरोप में सबसे ज्यादा है। जहां यूरोप का बाजार कमजोर हो चला वहीं अमेरिका से टैरिफ विवाद के चलते निर्यात एकदम से रुक सा गया था।
अमेरिकी आयातक अब 50 फीसदी के टैरिफ की भरपाई कालीन कारोबारियों से कर रहे थे जो संभव नहीं थी। अमेरिका बाजार में काम करना टेढ़ा है वहीं माल भेजने के बाद उसकी बिक्री के उपरांत ही भुगतान मिलता है जिसमें कभी-कभी साल-दो साल भी लग सकता है। इसके उलट निर्यातक को टैरिफ का भुगतान को तुंरत करना पड़ता जो संभव नही।
टैरिफ में कमी के बाद तुंरत कारोबार तेजी से बढ़ेगा लिहाजा बुनकरों की मांग बढ़ेगी और मजदूरी भी। इस एलान ने कालीन उद्योग में रोजगार के नए रास्ते भी खोल दिए हैं। उनका कहना है कि भदोही-मिर्जापुर में बनने वाली कालीनों के 60 फीसदी अमेरिका को जाता था। इतने दिनों से आर्डर बंद थे लिहाजा टैरिफ कम होने के बाद तेजी से मांग आएगी।

