ईयू ने भारत को मिलने वाले तरजीही निर्यात लाभ किए निलंबित, वस्त्र और स्टील जैसे क्षेत्रों पर पड़ेगी बड़ी मार
मुंबई- यूरोपीय संघ (ईयू) ने भारत सहित कुछ देशों के लिए तरजीही योजना के तहत वस्त्र जैसे क्षेत्रों को दिए जाने वाले निर्यात लाभों को एक जनवरी से निलंबित कर दिया है। इस कदम से यूरोपीय संघ को होने वाले देश के निर्यात पर असर पड़ने की आशंका है। यह तब हुआ, जब दोनों पक्ष व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में लगे हुए हैं।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के अनुसार, इस फैसले से भारत को यूरोपीय संघ के बाजार में बड़ा झटका लग सकता है, क्योंकि वरीयता योजना लाभों को निलंबित करने के बाद ईयू को होने वाले 87 फीसदी निर्यात पर आयात शुल्क बढ़ जाएगा। कृषि और चमड़ा सहित केवल लगभग 13 फीसदी निर्यात को ही इस योजना के तहत लाभ मिल रहा है। वरीयता योजना रियायतों के तहत भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय संघ के बाजारों में सर्वोत्तम पसंदीदा राष्ट्र (एमएफएन) टैरिफ से कम दर पर माल भेजने की सुविधा मिलती थी। अब यूरोपीय संघ को निर्यात किए जाने वाले भारतीय सामानों के 87 फीसदी मूल्य पर ये रियायतें निलंबित कर दी गई हैं।
इसका मतलब कि 12 फीसदी टैरिफ वाले परिधान उत्पाद को वरीयता योजना के तहत केवल 9.6 फीसदी का भुगतान करना पड़ता था। इस वर्ष एक जनवरी से यह लाभ समाप्त हो जाएगा और निर्यातकों को पूरा 12 फीसदी शुल्क देना होगा। यूरोपीय संघ ने लगभग सभी प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों खनिज, केमिकल, प्लास्टिक और रबर, वस्त्र-परिधान, पत्थर-सिरेमिक, बहुमूल्य धातुएं, लोहा-स्टील, मशीनरी, विद्युत उपकरण और परिवहन उपकरण में वरीयता योजना लाभ समाप्त कर दिए हैं। ये सभी यूरोप को भारत के निर्यात की रीढ़ हैं।
तीन वर्षों के लिए रियायतें वापस ली गईं
यूरोपीय संघ समय-समय पर इन लाभों को कम करता है। 2013 और 2023 में भी यही किया था। अब 2026 से 2028 तक तीन वर्षों के लिए ये रियायतें पूरी तरह से वापस ले ली गई हैं। यह इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि दोनों पक्ष 27 जनवरी को मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के लिए वार्ता समाप्त करने की घोषणा कर सकते हैं। भारत-ईयू एफटीए के संपन्न होने को लेकर आशावाद तो हैं, लेकिन वास्तविकता में भारतीय निर्यातकों को निकट भविष्य में व्यापार संबंधी और अधिक बाधाओं का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि वरीयता योजना का समाप्त होना यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (सीबीएएम) के कर चरण की शुरुआत के साथ मेल खाता है।
एफटीए के अमल में आने में लगेगा लंबा समय
एफटीए के कार्यान्वयन में कम से कम एक वर्ष या उससे भी अधिक समय लगने की संभावना है। ऐसे में ईयू को भारत के निर्यात को उच्च शुल्क, बढ़ती अनुपालन लागत और कमजोर प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। इससे निर्यातकों को ऐसे समय में झटका लगेगा, जब वैश्विक व्यापार की स्थितियां अब भी नाजुक बनी हुई हैं। वस्त्र जैसे मूल्य-संवेदनशील क्षेत्रों में यह वृद्धि भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को कमजोर करने और ईयू के खरीदारों को बांग्लादेश और वियतनाम जैसे शुल्क मुक्त आपूर्तिकर्ताओं की ओर धकेलने के लिए पर्याप्त है।
भारत का 17 फीसदी निर्यात ईयू को
2024-25 में ईयू के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार 136.53 अरब डॉलर था। इसमें 75.85 अरब डॉलर का निर्यात और 60.68 अरब डॉलर का आयात था। यानी भारत के कुल निर्यात का लगभग 17 फीसदी है। ईयू का भारत को किया जाने वाला निर्यात उसके विदेशी निर्यात का 9 फीसदी है।

