STT Vs LTCG: जिसे हटाने के लिए लाया गया था वही टैक्स अब भी कायम, निवेशकों से क्यों वसूले जा रहे दोनों

मुंबई- तारीख 1 अक्टूबर 2004। तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने शेयर बाजार में मुनाफे पर लगने वाले लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स को हटा दिया। इसके बदले में उन्होंने सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) पेश किया। तर्क सीधा था- मुनाफे पर टैक्स छोड़ो, हर सौदे पर टैक्स दो। 14 साल तक सब ठीक चला, लेकिन 2018 के बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने LTCG टैक्स को दोबारा लागू कर दिया। 2004 के तर्क से तो तब STT हट जाना चाहिए था, क्योंकि उसे LTCG की जगह ही लाया गया था। लेकिन सरकार ने इसे नहीं हटाया।

अब 2026 के बजट में इन्वेस्टर कम्युनिटी को उम्मीद थी कि पिछले कुछ सालों में बढ़ाए गए STT और कैपिटल गेन टैक्स (STCG/LTCG) में कुछ राहत मिलेगी। ऐसा इसलिए क्योंकि पिछले डेढ़ साल से मार्केट में सुस्ती है, विदेशी निवेशक लगातार अपने पैसे निकाल रहे हैं। लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसके अलट F&O ट्रेडिंग पर STT को ढाई गुना तक बढ़ा दिया। सरकार के इस कदम के पीछे का तर्क रिटेल निवेशकों की सुरक्षा को बताया। सेबी के डेटा के मुताबिक, F&O ट्रेडिंग करने वाले 95% से ज्यादा रिटेल ट्रेडर्स अपना पैसा गंवा देते हैं।

जब भी आप शेयर बाजार में कोई शेयर खरीदते या बेचते हैं, या फ्यूर एंड ऑप्शन्स में कोई सौदा करते है तो सरकार उस ट्रांजैक्शन पर फीस वसूलती है। इसे ही STT कहते हैं। STT आपके ट्रेडिंग अकाउंट से अपने आप कट जाता है और ब्रोकर इसे सरकार के पास जमा कर देता है।

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