आईसीआईसीआई बैंक घोटाला: लिस्टिंग नियमों के उल्लंघन पर नियामक सख्त, न्यायिक कार्रवाई की सिफारिश
मुंबई : देश के सबसे चर्चित बैंकिंग मामलों में शामिल आईसीआईसीआई बैंक-वीडियोकॉन प्रकरण में नियामकीय जांच ने गंभीर खामियों की ओर इशारा किया है। बाजार नियामक सेबी की प्रारंभिक रिपोर्ट में कहा गया है कि बैंक और वीडियोकॉन समूह के बीच हुए कई वित्तीय लेन-देन में हितों का टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) था और तत्कालीन शीर्ष प्रबंधन द्वारा जरूरी खुलासे नहीं किए गए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बैंक अपने निदेशकों द्वारा लिस्टिंग नियमों और कॉरपोरेट गवर्नेंस मानकों का पालन सुनिश्चित करने में विफल रहा, जिसके चलते आईसीआईसीआई बैंक और पूर्व सीईओ चंदा कोचर के खिलाफ न्यायिक कार्रवाई की सिफारिश की गई है।
नुपावर में हिस्सेदारी और 64 करोड़ के डिबेंचर का मामला
जांच में खुलासा हुआ कि जून 2009 में वीडियोकॉन समूह के प्रवर्तक वेणुगोपाल धूत और दीपक कोचर के परिवार से जुड़ी कंपनी पैसिफिक कैपिटल ने अपनी हिस्सेदारी नुपावर रिन्यूएबल्स में सुप्रीम एनर्जी को बेच दी थी। हालांकि, नियामक को बाद में यह संकेत मिले कि धूत ने सुप्रीम एनर्जी के जरिए 64 करोड़ रुपये के डिबेंचर सब्सक्राइब कर नुपावर में परोक्ष रूप से अपनी हिस्सेदारी बनाए रखी। इसके अलावा, क्रेडेंशियल फाइनेंस से जुड़े लेन-देन में भी दीपक कोचर और वीडियोकॉन समूह के बीच संबंधों की पुष्टि हुई है, जिसने कथित तौर पर बदले में लाभ के आरोपों को और मजबूत किया।
सेबी की प्रारंभिक रिपोर्ट में क्या कहा गया
सेबी की रिपोर्ट के अनुसार, आईसीआईसीआई बैंक द्वारा वीडियोकॉन समूह को दिए गए कर्ज और उससे जुड़े पुनर्गठन प्रस्तावों में कोचर परिवार के सदस्यों की भूमिका संदेह के घेरे में है। नियामक ने निष्कर्ष निकाला कि चंदा कोचर ने अपने पति के कारोबारी हितों और वीडियोकॉन के साथ लेन-देन का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं किया, जो लिस्टिंग समझौते और कॉरपोरेट गवर्नेंस नियमों का उल्लंघन माना गया।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बैंक के बोर्ड और प्रबंधन ने यह सुनिश्चित करने में पर्याप्त सतर्कता नहीं बरती कि उसके निदेशक सभी जरूरी खुलासे करें। इसी आधार पर आईसीआईसीआई बैंक और चंदा कोचर दोनों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की सिफारिश की गई है।
3,250 करोड़ रुपये के कर्ज और पुनर्गठन पर सवाल
जांच के दायरे में 2012 में वीडियोकॉन समूह को दिया गया 3,250 करोड़ रुपये का ऋण भी शामिल है। आरोप है कि इस ऋण के पुनर्गठन और अन्य संस्थाओं को दिए गए कर्ज से जुड़े फैसलों में कोचर परिवार से जुड़ी संस्थाओं को अप्रत्यक्ष लाभ मिला। नियामक दस्तावेजों में इन मामलों को बदले में लाभ के आरोपों और हितों के टकराव के संभावित उदाहरण के तौर पर दर्ज किया गया है।
इस्तीफे से बर्खास्तगी तक, टकराव बढ़ा
आईसीआईसीआई बैंक की पूर्व प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी चंदा कोचर ने बैंक को कानूनी नोटिस भेजकर उनके इस्तीफे को ‘कारणवश बर्खास्तगी’ के रूप में दर्ज किए जाने पर कड़ा विरोध जताया है। उन्होंने अप्रैल 2009 से मार्च 2018 के बीच मिले बोनस और स्टॉक ऑप्शन की रकम लौटाने से भी इनकार कर दिया है।
30 जनवरी को बैंक के बोर्ड ने घोषणा की थी कि वह कोचर को दिए गए सभी लाभ वापस लेगा। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी. एन. श्रीकृष्णा की अध्यक्षता वाली जांच समिति की रिपोर्ट के बाद लिया गया, जिसमें वीडियोकॉन ऋण मामले में कोचर को बैंक की आचार संहिता के उल्लंघन का दोषी ठहराया गया था।
समिति की सिफारिशों के आधार पर, कोचर को सीईओ के तौर पर मिले लगभग 10 करोड़ रुपये के बोनस और उनके पास मौजूद करीब 60 लाख शेयर लौटाने के निर्देश दिए गए थे।
कानूनी पत्र में क्या कहा कोचर ने
चंदा कोचर के वकील द्वारा भेजे गए पत्र में बैंक में उनके लगभग 34 वर्षों के कार्यकाल, पेशेवर योगदान और ईमानदार छवि का उल्लेख किया गया है। पत्र में कहा गया कि बैंक के फैसले से उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है। पत्र में यह भी तर्क दिया गया कि बैंक में कोई भी ऋण निर्णय एकतरफा नहीं था, बल्कि समिति आधारित सामूहिक प्रक्रिया के तहत लिया गया था। कानूनी टीम ने बैंक की प्रतिक्रिया के बाद आगे की रणनीति तय करने की बात कही है।

