अब तो हद हो गई भइया, रुपया की बेइज्जती नहीं सही जाती, 91 के भी नीचे पहुंचने में शर्म नहीं

मुंबई- रुपया मंगलवार को कारोबार के दौरान पहली बार डॉलर के मुकाबले 91 के स्तर को पार कर गया। रुपये की इस कमजोरी के पीछे भारत-अमेरिका के बीच व्यापार समझौते में देरी और विदेशी फंडों की लगातार बिकवाली मुख्य कारण हैं। जानकारों का मानना है कि रुपये की गिरावट में सक्रिय तौर पर दखल न देना सरकार की सोची-समझी रणनीति का हिस्‍सा हो सकता है। उन्‍हें लगता है कि इसके जरिये शायद वह निर्यात को प्रतिस्‍पर्धी बनाए रखना चाहती है। रुपये के कुछ हद तक नीचे जाने से ऐसा मुमकिन है।

भारतीय रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया है। इससे यह एशियाई मुद्राओं में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी बन गई है। व्यापार संतुलन के बेहतर आंकड़े आने के बावजूद रुपये को कोई सहारा नहीं मिला।’ इस साल रुपया 6% तक गिर चुका है। भारत पर अमेरिका ने भारी भरकम टैरिफ लगाया है। सरकार चाहती है कि निर्यात प्रतिस्पर्धी बना रहे। इसके लिए एक तरीका यह है कि रुपये को कुछ हद तक गिरने दिया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि शायद भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) भी निर्यात को फायदा पहुंचाने के लिए रुपये को थोड़ा और गिरने दे रहा है।

 यह गिरावट विदेशी निवेशकों के भारतीय बाजार से पैसा निकालने के कारण है। जब विदेशी निवेशक भारत से अपना पैसा निकालकर दूसरे देशों में लगाते हैं तो डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपये की कीमत गिर जाती है। भारत और अमेरिका के बीच व्यापार को लेकर चल रही बातचीत भी बाजार में अनिश्चितता पैदा कर रही है। इससे निवेशक सतर्क हो गए हैं। रुपया सुबह के कारोबार में डॉलर के मुकाबले 91 के स्‍तर को पार कर गया। एक समय यह 91.14 पर कारोबार कर रहा था जो पिछले बंद भाव से 36 पैसे की गिरावट दर्शाता है। रुपया पिछले 10 कारोबारी सत्र में डॉलर के मुकाबले 90 से गिरकर 91 पर आ गया। यह पिछले पांच सत्र में ही डॉलर के मुकाबले एक फीसदी लुढ़का है।

अमेर‍िकी राष्‍ट्रपत‍ि डोनाल्‍ड ट्रंप के टैरिफ के बावजूद नवंबर में भारत का एक्‍सपोर्ट 19.37% बढ़ा है। यह बढ़कर 38.13 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। इस के चलते देश का व्यापार घाटा पांच महीने के निचले स्तर 24.53 अरब डॉलर पर आ गया। रुपये की गिरावट और निर्यात के बीच सीधा और सकारात्मक संबंध होता है। जब रुपया अमेरिकी डॉलर जैसी अन्य मुद्राओं के मुकाबले गिरता है तो भारतीय सामान और सेवाएं विदेशी खरीदारों के लिए सस्ती हो जाती हैं।

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