कोर्ट ने कहा, पत्रकारों को बताना होगा खबर का सोर्स, किसी तरह की छूट नहीं 

मुंबई- दिल्ली की एक अदालत ने कहा है कि भारत में पत्रकारों को जांच एजेंसियों को अपने स्रोत का खुलासा करने से कोई वैधानिक छूट नहीं है। मुख्य मेट्रोपॉलिटन मैजिस्ट्रेट अंजनी महाजन ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की ओर से दायर एक ‘क्लोजर रिपोर्ट’ को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। रिपोर्ट में सीबीआई ने दावा किया था कि वह कथित जालसाजी के मामले में जांच पूरी नहीं कर सकी, क्योंकि कथित जाली दस्तावेजों को प्रकाशित और प्रसारित करने वाले पत्रकारों ने उन स्रोतों का खुलासा करने से इनकार कर दिया था जहां से उन्होंने इसे इसे हासिल किया था। 

FIR के मुताबिक, कुछ समाचार चैनलों और समाचार पत्रों ने 9 फरवरी, 2009 को यानी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की तय तारीख से एक दिन पहले दिवंगत नेता मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले से संबंधित रिपोर्ट प्रसारित और प्रकाशित की थी। समाचार प्रकाशित होने के बाद, सीबीआई ने एजेंसी की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए कथित तौर पर फर्जी और मनगढ़ंत रिपोर्ट तैयार करने के आरोप में अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी। हालांकि बाद में सीबीआई ने इस मामले में ‘क्लोजर रिपोर्ट’ दाखिल कर दी थी। 

मेट्रोपॉलिटन मैजिस्ट्रेट ने रिपोर्ट को खारिज कर दिया और सीबीआई को पत्रकारों से पूछताछ करने का निर्देश दिया। न्यायाधीश ने कहा, ‘भारत में पत्रकारों को जांच एजेंसियों को अपने स्रोत का खुलासा करने से कोई वैधानिक छूट नहीं है, विशेष रूप से जहां एक आपराधिक मामले की जांच में सहायता के उद्देश्य से इस तरह का खुलासा आवश्यक है।’ यह आदेश मंगलवार को सुनाया गया। उसके बाद अदालत ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर दिया था। इसने कहा कि जांच को उसके तार्किक निष्कर्ष तक नहीं ले जाया गया है और इस प्रकार एजेंसी को पत्रकारों से पूछताछ करने का निर्देश दिया। 

मंगलवार (17 जनवरी) को पारित आदेश में अदालत ने कहा, ‘केवल इसलिए कि संबंधित पत्रकारों ने अपने संबंधित स्रोतों का खुलासा करने से इनकार कर दिया, जैसा कि अंतिम रिपोर्ट में कहा गया है, जांच एजेंसी को पूरी जांच पर रोक नहीं लगानी चाहिए थी. भारत में पत्रकारों को जांच एजेंसियों के समक्ष अपने स्रोतों का खुलासा करने से कोई वैधानिक छूट प्राप्त नहीं है। 

सीबीआई ने यह भी कहा था कि जांच के दौरान संबंधित मीडिया घरानों से संबंधित दस्तावेज मांगे गए थे, लेकिन उन्होंने कोई दस्तावेज नहीं दिया। 

दलील को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि सीबीआई को संबंधित पत्रकारों/समाचार एजेंसियों को नोटिस जारी करके आवश्यक जानकारी प्रदान करने या मामले के जरूरी तथ्य उसके संज्ञान में लाने के लिए बाध्य करने का पर्याप्त अधिकार है।

जज ने कहा, ‘अंतिम रिपोर्ट जांच के इस पहलू पर चुप्पी साध लेती है कि कि सीबीआई का आधिकारिक दस्तावेज (सील बंद स्थिति रिपोर्ट) जो अगले दिन सुप्रीम कोर्ट में पेश होनी थी, वह कैसे सीबीआई के कार्यालय से लीक होकर मीडिया में पहुंच गई। 

अदालत ने कहा, ‘अंतिम रिपोर्ट में इस पहलू पर की गई किसी भी जांच का खुलासा नहीं किया गया है कि कैसे जालसाज ने तिलोत्तमा वर्मा की मूल नोट-शीट में तक पहुंच प्राप्त की, जिससे हस्ताक्षर उठाए गए और केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (सीएफएसएल) की राय के मुताबिक जाली दस्तावेजों पर उनका इस्तेमाल किया गया। 

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2007 में सीबीआई को निर्देश दिया था कि वह मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार के सदस्यों द्वारा अर्जित संपत्ति की प्रारंभिक जांच करे। इसके अनुपालन में 5 मार्च 2007 को एक प्रारंभिक जांच शुरू की गई, जो 26 अक्टूबर 2007 को पूरी हुई। 

एकत्र किए गए सबूतों के आधार पर एक स्थिति रिपोर्ट तैयार की गई और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दो सीलबंद लिफाफों में प्रस्तुत की गई। 9 फरवरी 2009 को मामले की सुप्रीम कोर्ट में अंतिम सुनवाई थी, लेकिन इससे एक दिन पहले ही जाली दस्तावेजों के आधार पर मीडिया घरानों द्वारा इस संबंध में खबरें चला दी गईं। 

दर्ज शिकायत में यह आरोप लगाया गया कि ऐसा एक आपराधिक साजिश के तहत सीबीआई की छवि खराब करने के लिए किया गया था।

बहरहाल, अंतिम रिपोर्ट में तर्क दिया गया था कि समाचार चैनल द्वारा इस्तेमाल किए गए दस्तावेज जाली थे, लेकिन यह स्थापित नहीं किया जा सका कि किसने जाली दस्तावेज बनाए, क्योंकि इन जाली दस्तावेजों के उपयोगकर्ताओं ने स्रोत का खुलासा नही किया, इसलिए आपराधिक साजिश साबित करने के लिए कोई पर्याप्त सामग्री और सबूत नहीं हैं। 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *