फसल खरीदने पर न दी जाए एमएसपी, कई और क्षेत्र में सरकार का हस्तक्षेप जरूरी 

मुंबई- सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद ने कहा कि कृषि फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तब तक ही जारी रहे, जब तक बाजार प्रतिस्पर्धी और कुशल न हो जाएं। साथ ही इसे खरीद के बजाय किसी और माध्यम से किसानों को दिया जाना चाहिए।  

एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि डिफिसिएंसी प्राइसिंग पेमेंट (डीपीपी) एक ऐसा मॉडल है, जिसके आधार पर एमएसपी दी जा सकती है। लेकिन एक बार इसके अमल में आने पर इसे रोका नहीं जा सकता है। डीपीपी का मतलब खुले बाजार के भाव और किसानों को दिए जाने वाले एमएसपी के भाव में अंतर होता है। खुले भाव और एमएसपी के बीच भाव में 12-15 फीसदी का अंतर होता है। इसका मतलब 80,000 करोड़ रुपये की जरूरत होगी। इस तरह का मॉडल मध्य प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में लागू भी किया गया है।  

न्यूनतम समर्थन मूल्य 22-23 फसलों पर लागू है। चंद ने कहा कि कृषि से जुड़े क्षेत्र जैसे मछलीपालन और डेयरी भी तेजी से बढ़ रहे हैं, जिसमें सरकार का बहुत कम हस्तक्षेप है। पिछले 8 साल में मत्स्य क्षेत्र की विकास दर 10 फीसदी रही है। 

कृषि में उत्पादन के बाद होनेवाली चुनौतियों को सरकार कम करने की योजना पर काम कर रही है। इसके लिए कई सारे कदम उठाए जा रहे हैं। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि इसके लिए जरूरी ढांचा तैयार किया जा रहा है। 1,000 विनियमित (रेगुलेटेड) थोक बाजारों से इलेक्ट्रॉनिक नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट (ई-नाम) के जरिये सरकार जुड़ी है। साथ ही एग्री-इन्फ्रा फंड के तहत 13,000 प्रोजेक्ट को 9,500 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं। 

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