पंडितों की गुरू लोना चमारिन, तंत्र साधना में महारत हासिल, 11 ठाकुरों को उतारा मौत के घाट

मुंबई- लोना चमारिन असम कामरूप क्षेत्र की एक प्रख्यात तांत्रिक स्त्री थी जो चमार जाति से थी और उसकी सिद्धियों को देखकर कई ब्राह्मणो ने भी उसे अपना गुरु बनाया था। वामपन्थी तंत्र साधनाओ में विख्यात कलुआ तंत्र साधना में लोना चमारिन को महारथ हासिल थी…लोना चमारिन ने 52 कलुये सिद्ध किये थे। आज भी अगर कामख्या जाते है तो वहां नीलांचल पर्वत में एक ऐसा क्षेत्र है जिसे “त्रिया प्रदेश’ कहा जाता है। उस क्षेत्र में कोई नही जाता।

ऐसी मान्यता है कि उस क्षेत्र में अगर कोई पुरूष चला जाये तो वो वापिस आ ही नही सकता।। उस क्षेत्र में महागुरु मत्स्येंद्रनाथ ने एक बार प्रवेश जरूर किया था….कहा जाता है कि आज भी उस क्षेत्र में लोना चमारिन का निवास है। साबर मन्त्रो और असम की असमिया भाषा मे बने मंत्रो में लोना चमारिन का नाम बार बार पढ़ने को मिल जाता हैं। लोना चमारिन के नाम से कई मंत्र साबर-साधनाओ में प्रचलित है। पंजाब प्रांत के अमृतसर में एक चमार परिवार में जन्मीं, परियों समान सुन्दर लड़की। बालपन से ही उसकी सुन्दरता पर मोहित हर किसी कि गंदी नज़र पड़ने लगी।

लोना चमारिन के नाम से बहुत सारे शाबर मंत्रों की सिद्धि की जाती है। ऐसा मानना है लोना चमारिन द्वारा अपने नाम से बधित ये सभी शाबर मंत्र अचूक फलदायी होता है। लोना चमारिन पंजाब राज्य के अमृतसर जिले में चमरी गांव की रहने वाली थी। असम राज्य के कामरू जिला कामाख्या में जाकर अपनी सिद्धी प्राप्त कर एक विश्व विख्यात योगिनी बनती है। तो आखिर एक पंजाब की लड़की असम राज्य के कामरुप जिले में कामाख्या शक्तिपीठ पर कैसे पहुंची और वो भी 11वीं शताब्दी में।

चमरी गांव में एक चमार जाती का छोटा परिवार रहता था। आपको इतना तो पता ही है उस समय इन छोटी जातियों के प्रति बड़ी जातियों के लोगों का क्या व्यवहार था? उस समय उस चमार परिवार की भी दशा वही थी। उस चमार परिवार में एक बहुत सुंदर लड़की का जन्म हुआ इतना सुंदर थी कि बालपन से ही सभी मोहित थे। उसकी सुन्दरता के साथ उस लड़की का नाम पड़ा लोना। लोना लावण्य का प्रतिरूप बन गयी। यानी कि लोग अब किसी सुन्दरी को लोना के ही नाम से जानने लगे हैं।

लोना बहुत सुन्दर थी लेकिन गरीब घर में सुन्दरता वरदान नही अभिशाप होती है। लोना के लिए सुन्दरता अभिशाप ही बन गयी थी। जैसे जैसे वह बड़ी होती जा रही थी। गांव के लोगों कि नजरें उसपर गलत रुप से पड़ने लगी थी। लोना के माता-पिता सहित दो भाई थे। एक भाई का नाम था इलय दूसरे का नाम था गेंदा। ये दोनों भाई अपनी बहन लोना के प्रति गांव वालों की बिगड़ती नज़र को लेकर बहुत चिंतित रहा करते थे। गांव वालों से लोना की आबरू बचाने के लिए बालपन में ही विवाह करा करा दिया गया। गांव में कुछ सालों रही फिर गौना के साथ अपने पति घर चली गई।

लोना का विवाह सफल नही रहा ससुराल में कलह होने लगा। लोना का अपने पति से झगड़ा हुआ वापस अपने मायके चली आई। अब लोना लगभग 12-14 साल की युवती हो गई थी। विवाहिता तो थी लेकिन पति को छोड़कर अपने गांव में रह रही थी। एक कथाकथित छोटी जाती की थी, गरीबी में पल-बढ़ रही थी। यौवन भी थोड़ा आ चुका था। ऐसे में गांव वालों की नज़र खराब हो जाए तो उस समय के हिसाब से कोई संदेह वाली बात नहीं है। और हुआ भी वही उस चमरी गांव के लोगों ने लोना के ऊपर अपनी-अपनी गंदी नज़र डालना शुरू कर दिया। उसी गांव में एक दबंग 11 ठाकुरों का परिवार रहता था। जिस परिवार में 11 पुरुष थे इसलिये वह 11 ठाकुरों का परिवार कहा जाता था। उसी 11 ठाकुर खानदान से एक लड़का लोना के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करने का निमंत्रण दिया। लेकिन लोना ने इन्कार कर दी।

लोना के मना करने से क्रोधित ठाकुर लड़के का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया, कि हमें यह लड़की मना कैसे कर रही है? बात ठाकुर घराने की इज्जत की थी, फिर ठाकुर खानदान के सभी लोगों ने बारी-बारी से उस लड़की को अपने दरवाज़े पर नंगा कर बलात्कार किया। लोना अभी अधयुवा थी, अभी उसका यौवन पूरी तरह परिपक्त भी नहीं था, तभी उसके साथ इतनी बड़ी दरिन्दगी भरी घटना घट गई। तब न ही कोई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट था। न संविधान, न ही राजा के पास ऐसी घटनाओं की सुनवाई के लिए समय। उस समय ज्यादातर राजा महाराजा भी तो छोटी जातियों की लड़की औरतों का शोषण ही करते थे।

राजा ऐसी मामलों की सुनवाई करता भी था तो जीत बड़ी जातियों की ही होती थी। लोना की दुर्दशा पर पूरा गांव हंसता रहा किसी ने उन 11 ठाकुरों के तरफ़ ऊगली उठाने की सोच भी नहीं रखी। युवा अवस्था का जोश ऐसा होता ही है, कि आदमी कुछ भी कर गुजरता है। लोना चाहती थी, अपने ऊपर हुए अत्याचार का बदला लेना। लेकिन लोना के सामने बदला लेने का कोई रास्ता दिख नहीं रहा था। उस समय तंत्र-मंत्र का प्रचार-प्रसार जोरों पर था। योगियों एवं योगिनीयों ने अपने प्रचार-प्रसार का बहुत सारे माध्यम भी फैला दिए थे।

वे योगीजन बाबा गोरखनाथ के परंपरा से आते थे। इन योगिनीयों और योगियों के चलते ही संस्कृत मंत्रोच्चार की जगह शाबर मंत्रोच्चार का प्रचलन बढ़ने लगा था। तंत्र-मंत्र में शाबर मंत्रोच्चार का प्रयोग होता था। यह वही समय था, जब भारत में इस्लाम के सूफ़ी मत को मानने वाले लोग अपना पैर पसार चुके थे। ये सूफ़ी संत भी भारतीय पद्धति से मिलजुलकर एक नयी पद्धति का निर्माण कर रहे थे। इसी पद्धति में आता है शाबर मंत्रोच्चार। एक तो शावर मंत्र वो है जो पारंपरिक योग भाषा संस्कृत के अलावा स्थानीय ग्रामीण भाषाओं में लिखा पढ़ा जाता है।

सनातन धर्म में मंत्रोच्चार संस्कृत भाषा में है, लेकिन इसके विपरीत शाबर मंत्र का उच्चारण स्थानीय भाषाओं में किया जाता है। अधिकतर संस्कृत मंत्रो का सीधा अनुबाद नही होता। किन्तु उसका एक पूर्व निर्धारित अर्थ हो सकता है। शाबर मंत्रों में संस्कृत के शब्दों का प्रयोग कम, स्थानीय भाषा सहित हिन्दी, उर्दू, फारसी के शब्दों का प्रयोग ज्यादा इस्तेमाल होता है। संस्कृत के मंत्र बहुत ही शुद्ध और पवित्र होते हैं। संस्कृत के मंत्र पवित्र ह्दय से सिद्ध किए जाते हैं। शाबर मंत्रों की सिद्धि कोई भी मनुष्य एक बार सिद्ध कर अपने नाम से बांध दे तो उसे सिद्ध तांत्रिक कहा जाता है और उसके सिद्ध मंत्रों की सिद्धि अन्य कोई व्यक्ति बहुत ही आसानी से उसके नाम मात्र का स्मरण कर प्राप्त कर लेता है।

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