वैश्विक संकट की आंधी में डगमगाया ICICI बैंक, शेयर टूटे और जमाकर्ताओं में फैली असुरक्षा

मुंबई: वैश्विक वित्तीय संकट ने 2008 में भारतीय बैंकिंग सेक्टर की मजबूती की कड़ी परीक्षा ली थी और इसका सबसे बड़ा झटका देश के प्रमुख निजी बैंक आईसीआईसीआई बैंक को लगा। 2003 से 2008 के बीच आक्रामक विस्तार और तेज विकास के दम पर आगे बढ़ रहा ICICI बैंक अचानक संकट के केंद्र में आ गया। सितंबर 2008 में अमेरिकी निवेश बैंक लेहमन ब्रदर्स के दिवालिया होने के बाद वैश्विक बाजारों में मची उथल-पुथल ने बैंक के शेयरों को बुरी तरह तोड़ दिया और जमाकर्ताओं के बीच असुरक्षा की भावना गहराने लगी।

लेहमन संकट के बाद सितंबर 2008 के मध्य से ही ICICI बैंक के शेयरों में भारी बिकवाली देखने को मिली। कुछ ही हफ्तों में शेयर अपने शिखर से लगभग आधे रह गए और साल 2008 के अंत तक इनमें करीब तीन-चौथाई तक की गिरावट दर्ज की गई। बाजार में यह गिरावट सिर्फ शेयर कीमतों तक सीमित नहीं रही, बल्कि बैंक की वित्तीय स्थिति और जमा की सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठने लगे।

शेयरों में तेज गिरावट और बढ़ते निवेशक भय के बीच ICICI बैंक ने सितंबर और अक्टूबर 2008 में बार-बार सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट किया कि बैंक की स्थिति मजबूत है और सभी जमाएं पूरी तरह सुरक्षित हैं। हालात की गंभीरता को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक को भी एक दुर्लभ बयान जारी करना पड़ा, जिसमें कहा गया कि ICICI बैंक के पास पर्याप्त पूंजी है और उसकी वित्तीय सेहत स्थिर है। इसके बावजूद बाजार में बना डर आसानी से खत्म नहीं हो पाया।

इस दौरान न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध ICICI बैंक को अपने खुदरा ऋण पोर्टफोलियो से भी दबाव का सामना करना पड़ा। बैंक के कुल ऋणों में खुदरा ऋणों की हिस्सेदारी आधे से अधिक थी और इनमें डिफॉल्ट के मामले बढ़ने लगे थे। बढ़ते जोखिम को देखते हुए बैंक ने नए ऋण देने की रफ्तार धीमी कर दी। इसका असर बैंक की विकास दर पर भी पड़ा, जो इससे पहले करीब एक-तिहाई की तेज वृद्धि दर्ज कर रही थी, लेकिन दो तिमाहियों के भीतर ही यह गति सुस्त पड़ गई।

उस समय बैंक के तत्कालीन प्रमुख के. वी. कामत ने कहा था कि ICICI बैंक अवसरों पर पैनी नजर बनाए रखेगा और विकास को बनाए रखने के लिए अपने पोर्टफोलियो का पुनर्संतुलन करेगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया था कि भारतीय बैंकिंग सेक्टर में अगले पांच वर्षों में बड़े पैमाने पर विलय देखने को मिल सकते हैं, ताकि बैंकों की वित्तपोषण क्षमता और आकार बढ़ाया जा सके।

कामत का मानना था कि भारतीय बैंक 8 से 10 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर के अनुरूप अभी पर्याप्त बड़े नहीं हैं। यदि भारत को चीन जैसी तेज आर्थिक वृद्धि हासिल करनी है, तो देश की वित्तीय प्रणाली को भी उसी स्तर का विस्तार और मजबूती देनी होगी। हालांकि, इस संकट काल में ICICI बैंक ने किसी बड़े अधिग्रहण या विलय की दिशा में तत्काल कदम उठाने के बजाय सतर्क रुख अपनाया।

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