50 करोड़ का आश्रम, 7.5 करोड़ की लग्ज़री कारें; कौन हैं माघ मेले में छाए सतुआ बाबा?
मुंबई- ललितपुर, उत्तर प्रदेश में जन्मे सतुआ बाबा का शुरुआती नाम संतोष तिवारी हुआ करता था। बाबा बने तो संतोष दास हो गए, मगर सतुआ खाने-खिलाने के चलते वह लोगों के बीच सतुआ बाबा कहलाने लगे। इन दिनों सतुआ बाबा माघ मेले में छाए हुए हैं। सतुआ बाबा वाराणसी में विष्णुस्वामी संप्रदाय के प्रमुख हैं। सतुआ बाबा शोभाराम तिवारी और राजा बेटी तिवारी के चार बच्चों में सबसे छोटे हैं। बताया जाता है कि जब उनका पारंपरिक स्कूली शिक्षा में मन नहीं लगा तो आध्यात्मिक शिक्षा हासिल करने के लिए 11 से 13 वर्ष की आयु के बीच घर छोड़ दिया था।
उनके बड़े भाई महेश तिवारी उन्हें वाराणसी के मणिकर्णिका घाट ले गए, जहां उन्हें मुख्य पुजारी यमुनाचार्य महाराज के मार्गदर्शन में विष्णु स्वामी संप्रदाय या सतुआ आश्रम में प्रवेश दिया गया। संतोष जल्द ही धार्मिक अध्ययन में लीन हो गए और एक प्रिय शिष्य बन गए। लगभग 2005 में संतोष दास ने औपचारिक रूप से सांसारिक जीवन का त्याग कर संन्यास ले लिया। उनके गुरु ने जीवित रहते ही उन्हें महामंडलेश्वर और उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था और 2011 में यमुनाचार्य महाराज के निधन के बाद संतोष ने विष्णु स्वामी संप्रदाय का नेतृत्व संभाला।
2012 में, वे इसके 57वें आचार्य बने और उन्हें ‘सत्तू बाबा’ की उपाधि प्राप्त हुई। यह उपाधि आश्रम के ‘पीठाधीश्वर’ या मुख्य पुजारी को दी जाती है और इसकी परंपरा 1990 के दशक के उत्तरार्ध से चली आ रही है, जब आश्रम आर्थिक कठिनाइयों से गुजर रहा था। उस समय, आश्रम के पुजारियों को पोषण के लिए सत्तू का सेवन करना पड़ता था। सतुआ बाबा को काशी विश्वनाथ का प्रतिनिधि भी कहा जाता है। उन्हें महाकुंभ 2025 के दौरान जगद्गुरु की उपाधि मिली थी। माघ मेले के दौरान सतुआ बाबा को आश्रम बनाने के लिए सबसे ज्यादा जमीन आवंटित की गई। मगर, उनकी चर्चा तब और ज्यादा हुई, जब उनकी पोर्श 911 टर्बो (कीमत करीब 4.4 करोड़ रुपये बताई जा रही है) और लैंड रोवर डिफेंडर (कीमत लगभग 3 करोड़ रुपये) की तस्वीरें वायरल हुईं।

