मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में ICICI बैंक के 18 कर्मचारियों की नौकरी गई, ऐसे खुला काले धन को सफेद करने का मामला
मुंबई : देश के सबसे बड़े निजी बैंकों में शामिल आईसीआईसीआई बैंक की तेज़ तरक्की के पीछे जहां अधिग्रहण और वैश्विक विस्तार की कहानी है, वहीं इसका इतिहास विवादों और घोटालों से भी अछूता नहीं रहा। साल 2013 में सामने आया मनी लॉन्ड्रिंग का मामला ऐसा ही एक बड़ा झटका था, जिसने बैंक की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया। इस प्रकरण में 18 कर्मचारियों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा, जबकि नियामक एजेंसियों ने बैंक की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए।
तेज विस्तार और अधिग्रहणों का दौर
- वर्ष 2000 के बाद ICICI बैंक ने आक्रामक विस्तार की रणनीति अपनाई।
- 2001 में मदुरा बैंक का अधिग्रहण
- 2002 में ग्रिंडलेज बैंक की दार्जिलिंग और शिमला शाखाएं
- 2005 में रूस के इन्वेस्टिट्सियोनो-क्रेडिटनी बैंक (IKB) का अधिग्रहण
- 2007 में सांगली बैंक का अधिग्रहण, जिसकी स्थापना 1916 में हुई थी और जिसकी करीब 198 शाखाएं थीं
इसके बाद 2010 में बैंक ऑफ राजस्थान (BOR) को करीब 30 अरब रुपये में खरीदा गया। इस डील को लेकर रिजर्व बैंक ने प्रमोटर्स की हिस्सेदारी घटाने में देरी पर आपत्ति भी जताई थी। बाद में BOR का ICICI बैंक में पूरी तरह विलय कर दिया गया।
CIBIL की स्थापना और विदेशी विस्तार
ICICI बैंक ने साल 2000 में क्रेडिट इन्फॉर्मेशन ब्यूरो ऑफ इंडिया लिमिटेड (CIBIL) की स्थापना में अहम भूमिका निभाई, जो आज भारत का सबसे बड़ा क्रेडिट ब्यूरो है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, नवंबर 2003 में ICICI बैंक कनाडा की स्थापना की गई और टोरंटो में इसकी शाखा खोली गई। 2008 में बैंक का कॉर्पोरेट ऑफिस टोरंटो के डॉन वैली बिजनेस पार्क में शिफ्ट किया गया।
कोबरापोस्ट स्टिंग और मनी लॉन्ड्रिंग का खुलासा
साल 2013 में ऑनलाइन मैगज़ीन कोबरापोस्ट ने एक गुप्त जांच के तहत ‘ऑपरेशन रेड स्पाइडर’ नाम से स्टिंग ऑपरेशन किया। 14 मार्च 2013 को जारी वीडियो फुटेज में ICICI बैंक के कुछ वरिष्ठ अधिकारी और कर्मचारी काले धन को सफेद करने के लिए सहमत होते दिखे। यह गतिविधियां सीधे तौर पर मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम, 2002 का उल्लंघन थीं।
सरकार और RBI की सख्त कार्रवाई
खुलासे के तुरंत बाद भारत सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मामले की जांच के आदेश दिए। 15 मार्च 2013 को ICICI बैंक ने जांच पूरी होने तक 18 कर्मचारियों को निलंबित कर दिया।
11 अप्रैल 2013 को RBI के तत्कालीन डिप्टी गवर्नर हारून राशिद खान ने कहा कि केंद्रीय बैंक मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों को लेकर ICICI बैंक के खिलाफ नियामकीय कार्रवाई शुरू कर रहा है। बाद में आंतरिक जांच के आधार पर इन कर्मचारियों को बैंक से बाहर का रास्ता दिखाया गया।
छवि पर असर और सबक
यह मामला ICICI बैंक के लिए एक बड़ा झटका साबित हुआ। एक ओर बैंक तेज़ी से बढ़ रहा था, वहीं दूसरी ओर कंप्लायंस और इंटरनल कंट्रोल सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े हुए। इस प्रकरण के बाद बैंकिंग सेक्टर में KYC, AML और आंतरिक निगरानी व्यवस्था को और सख्त किया गया।

