मेक इन इंडिया और पीएलआई का सबसे ज्यादा फायदा विदेशी ब्रांडों को, स्वदेशी कंपनियां पीछे

मुंबई- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने देश को सबसे बड़े उपभोक्ता वाले बाजार के साथ दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी फैक्टरी भी बना दिया है। स्वदेशी जैसे लक्ष्य को पाने में मेक इन इंडिया और उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन (पीएलआई) जैसी योजनाओं ने भी बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन इन योजनाओं का ज्यादा फायदा विदेशी ब्रांड उठा रहे हैं। सरकारी कंपनियां इसे दौड़ में पीछे हो रही हैं।

सरकार की कोशिशों का ही परिणाम है कि भारत उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स और स्मार्ट होम अप्लायंसेज के लिए दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बन गया है। यह बाजार उपभोक्ता के साथ विक्रेता के रूप में भी स्थापित हो चुका है। 2014–15 में मोबाइल का घरेलू उत्पादन महज 18 हजार करोड़ का था, जो 2024–25 में 28 गुना बढ़कर 5.45 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है। इसमें सबसे बड़ी भूमिका पीएलआई की रही है। आंकड़े यह भी बताते हैं कि इस योजना का सबसे ज्यादा लाभ विदेशी ब्रांडों को मिला है। स्वदेशी कंपनियां आज भी सरकारी योजनाओं का उतना लाभ नहीं उठा पातीं। एक फरवरी को पेश होने वाले बजट में घरेलू कंपनियों को उम्मीद जगी है कि सरकार अपनी योजनाओं में उन्हें समान अवसर दिलाने की कुछ घोषणा कर सकती है।

यह सब बौद्धिक संपदा और ब्रांडों के तहत हो रहा है, जिनका मालिकाना हक भारत के पास नहीं है। इसका मतलब है कि ये भविष्य सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां बेहतर लागत मिलने पर अन्य देशों की ओर अपनी विनिर्माण क्षमता मोड़ सकती हैं। भारत को दुनिया के लिए विनिर्माण केंद्र के रूप में भविष्य को सुरक्षित करने का एकमात्र तरीका भारतीय ब्रांड बनाना है जो न केवल भारत में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिस्पर्धा करें। पीएलआई जैसी स्कीम पूरी तरह उत्पादन और निवेश पर आधारित है।

ताइवान, दक्षिण कोरिया और चीन का दबदबा

आज कंज्यूमर ड्यूरेबल और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में ताइवान, दक्षिण कोरिया और चीन के ब्रांड सरकारी नीतियों का सबसे ज्यादा लाभ उठा रहे हैं। ऐसे में भारतीय विनिर्माता अपने ही बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते। सितंबर, 2025 तक 12 सेक्टर्स को 23,946 करोड़ रुपये पीएलआई के तहत बांटे जा चुके हैं। योजना ने 2 लाख करोड़ से भी ज्यादा का निवेश आकर्षित किया है।

सरकारी निविदाओं में नहीं हो रहा पालन

कंज्यूमर ड्यूरेबल और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्अर के सरकारी टेंडरों और थोक खरीद में अक्सर ग्लोबल ब्रांड जैसे सैमसंग, एसर, आसुस भाग लेते हैं और सफल होते हैं। यह कंपनियां अपने उत्पाद भारत में असेंबल करती हैं, लेकिन असली मूल्यवर्धन, डिजाइन और कोर आईपी विदेश में ही रहता है। इस तरह के टेंडर में भारतीय स्वामित्व वाले निर्माताओं को स्थानीय क्षमताओं के बावजूद नुकसान झेलना पड़ता है, क्योंकि उनकी उत्पादन क्षमता इनके मुकाबले कम होती है।

भारतीय कंपनियों को भी चाहिए अवसर

पीएलआई स्कीम से जुड़ी भारतीय कंपनियों का कहना है कि वे विदेशी खिलाड़ियों को बाहर करने की मांग नहीं कर रही हैं। बजाय इसके वे अपने लिए प्राथमिकता, समान अवसर और घरेलू मूल्यवर्धन का निष्पक्ष मूल्यांकन चाहती हैं। उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं और इलेक्ट्रॉनिक्स में भारतीय ब्रांडों में वोबल, डिक्सन और लावा जैसी भारतीय कंपनियां शामिल हैं। ये कंपनियां गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों का पालन करती हैं। घरेलू सप्लाई चेन में निवेश करती हैं।

तो बढ़ेंगी कंपनियां

सरकारी खरीदारी बाजार को मजबूत संकेत देती है। प्राथमिकता मिलने से भारतीय कंपनियां नई क्षमता हासिल कर सकती हैं और कोरियाई व चीनी प्रतिस्पर्धियों से कीमत में मुकाबला कर सकती हैं। दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों ने भी अपनी घरेलू कंपनियों को चैंपियन बनाने के लिए सरकारी खरीद का इस्तेमाल किया है। लिहाजा सरकार को भी स्वदेशी और भारतीय कंपनियों को इसी तरह के अवसर देने चाहिए।

देसी कंपनियों की सरकार से क्या डिमांड

भारतीय विनिर्माताओं ने उम्मीद जताई है कि जिन उत्पादों में गुणवत्ता मानक पूरे हों, वहां भारतीय स्वामित्व वाले निर्माताओं को प्राथमिकता दी जाए. सरकार की ओर से जारी होने वाले टेंडरों का मूल्यांकन घरेलू मूल्यवर्धन, लाइफसाइकल लागत और दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव के आधार पर किया जाए। भारतीय उत्पादों के लिए पायलट प्रोजेक्ट और चरणबद्ध तरीके से इस नीति को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। इसमें पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए, ताकि विदेशी और भारतीय खिलाड़ी समान प्रतिस्पर्धा कर सकें, असमान शर्तों पर नहीं।

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