2035 तक मोटापे की चपेट में आ सकते हैं देश के 8.3 करोड़ से ज्यादा बच्चे

मुंबई-देश में मोटापा बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में उभरेगा। आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि बच्चों में यह प्रवृत्ति अधिक चिंताजनक है। पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में अधिक वजन का प्रचलन 2015-16 में 2.1 फीसदी से बढ़कर 2019-21 में 3.4 फीसदी हो गया।2020 में भारत में 3.3 करोड़ से अधिक बच्चे मोटापे से ग्रस्त थे। यदि वर्तमान रुझान जारी रहे तो यह आंकड़ा 2035 तक तेजी से बढ़कर 8.3 करोड़ हो जाएगा।

सर्वे में चेतावनी दी गई है कि भारत में मोटापा चिंताजनक गति से बढ़ रहा है। इसके प्रमुख कारणों के रूप में अस्वास्थ्यकर आहार, गतिहीन जीवनशैली, अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों (यूपीएफ) की बढ़ती खपत और पर्यावरणीय कारक हैं। मोटापे का बढ़ता बोझ सभी आयु वर्ग और क्षेत्रों के लोगों को प्रभावित कर रहा है। चाहे वे शहरी हों या ग्रामीण। इससे मधुमेह, हृदय रोग और उच्च रक्तचाप जैसी गैर-संक्रामक बीमारियों (एनसीडी) का खतरा काफी बढ़ रहा है।

2019-21 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, 24 प्रतिशत महिलाएं और 23 फीसदी पुरुष या तो अधिक वजन वाले हैं या मोटापे से ग्रस्त हैं। 15-49 वर्ष की आयु के वयस्कों में 6.4 फीसदी महिलाएं मोटापे से ग्रस्त हैं। पुरुषों में यह 4 फीसदी है। भारत वैश्विक स्तर पर यूपीएफ की बिक्री के लिए सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक है और 2009 से 2023 के बीच इस क्षेत्र में 150 फीसदी से अधिक की वृद्धि हुई है।

38 अरब डॉलर हो गई यूपीएफ की बिक्री

यूपीएफ की खुदरा बिक्री 2006 में 0.9 अरब डॉलर से 40 गुना बढ़कर 2019 में 38 अरब डॉलर हो गई। इसी अवधि में पुरुषों और महिलाओं में मोटापे का स्तर दोगुना हो गया। यह वैश्विक रुझानों को दर्शाता है, जहां प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की ओर आहार परिवर्तन मोटापे में वृद्धि से निकटता से जुड़ा हुआ है। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (यूपीएफ) धीरे-धीरे लंबे समय से चले आ रहे आहार पैटर्न को रिप्लेस कर रहे हैं। इससे समग्र आहार की गुणवत्ता बिगड़ रही है और वसा, चीनी और नमक की उच्च मात्रा वाले खाद्य पदार्थों के संपर्क में आने का खतरा बढ़ रहा है।

कई बीमारियों को जन्म दे रहा अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड

द लैंसेट सीरीज ऑन अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स एंड ह्यूमन हेल्थ के तहत संकलित साक्ष्य यूपीएफ के अधिक सेवन को मोटापे, हृदय रोग, श्वसन संबंधी विकार, मधुमेह और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं सहित कई प्रतिकूल परिणामों से जोड़ते हैं। यूपीएफ के बढ़ते उपयोग से स्वास्थ्य देखभाल खर्च में वृद्धि, उत्पादकता में कमी और दीर्घकालिक राजकोषीय तनाव के रूप में एक महत्वपूर्ण आर्थिक बोझ भी पड़ रहा है।

आक्रामक तरीके से हो रही मार्केटिंग

सर्वेक्षण में यूपीएफ के आक्रामक मार्केटिंग को एक बड़ी चुनौती बताया गया है। इसमें भावनात्मक संदेशों, एक खरीदें एक मुफ्त पाएं जैसे आकर्षक ऑफर, मशहूर हस्तियों के प्रचार और यूपीएफ को स्वास्थ्यवर्धक विकल्प के रूप में पेश करने जैसी रणनीतियों के माध्यम से इसके अत्यधिक सेवन को बढ़ावा देने की बात कही गई है। अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों के विज्ञापनों के संपर्क में आने वाले किशोरों में ऐसे उत्पादों का सेवन बढ़ रहा है। इस तरह के मार्केटिंग अभियानों पर नियंत्रण का सुझाव दिया गया है। इसमें सुबह 6 बजे से रात 11 बजे के बीच सभी मीडिया में यूपीएफ के विज्ञापनों पर पूर्ण प्रतिबंध और शिशु एवं छोटे बच्चों के दूध और पेय पदार्थों के विपणन पर कड़े प्रतिबंध शामिल हैं।

चेतावनी लेबल से हो सकता है रोकथाम

चेतावनी लेबल यूपीएफ के सेवन को हतोत्साहित करने में प्रभावी हैं। इनमें शिशुओं और छोटे बच्चों के लिए लक्षित उत्पाद भी शामिल हैं। इसमें यूपीएफ के पोषक तत्वों और स्वास्थ्य संबंधी दावों पर प्रतिबंध लगाने की भी सिफारिश की गई है। राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत, 31.5 करोड़ से अधिक वयस्कों की जांच की गई है। इनमें से 8.47 करोड़ को अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त पाया गया है।

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