40 प्रतिशत दिहाड़ी कामगारों का मासिक वेतन 15 हजार रुपये से भी कम

मुंबई- संसद में 29 जनवरी को पेश किए गए इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक, भारत में लगभग 40% गिग वर्कर्स यानी फूड डिलीवरी, क्विक कॉमर्स और अन्य प्लेटफॉर्म से जुड़े कर्मचारियों की महीने की कमाई 15 हजार रुपए से भी कम है। सरकार से सिफारिश की गई है कि गिग वर्कर्स के लिए प्रति घंटा या प्रति टास्क के आधार पर ‘मिनिमम अर्निंग’ तय की जानी चाहिए। इसके अलावा, काम के इंतजार के दौरान लगने वाले समय के लिए भी पेमेंट दिए जाने का सुझाव सर्वे में दिया गया है।

इकोनॉमिक सर्वे में कहा गया है कि गिग वर्कर्स की फिक्स्ड इनकम न होने के कारण इन्हें बैंक से लोन मिलने या अन्य फाइनेंशियल सर्विस का फायदा उठाने में मुश्किल आती है। सरकार का मानना है कि पॉलिसी ऐसी होनी चाहिए कि लोग अपनी मर्जी से गिग वर्क चुनें, न कि मजबूरी में। सर्वे में उन प्लेटफॉर्म्स की भी आलोचना की गई है जो एल्गोरिदम के जरिए काम बांटते हैं। ये एल्गोरिदम ही तय करते हैं कि किसे कितना काम मिलेगा, परफॉरमेंस कैसी है और कमाई कितनी होगी। इस कंट्रोल की वजह से वर्कर्स पर काम का दबाव बढ़ रहा है। वे थकान और तनाव का शिकार हो रहे हैं।

देश में गिग वर्कफोर्स बहुत तेजी से बढ़ रही है। वित्त वर्ष 2021 में गिग वर्कर्स की संख्या 77 लाख थी, जो वित्त वर्ष 2025 में 55% बढ़कर 1.2 करोड़ पहुंच गई है। फिलहाल कुल वर्कफोर्स में इनकी हिस्सेदारी 2% से ज्यादा है। अनुमान है कि साल 2029-30 तक नॉन-एग्रीकल्चर सेक्टर की कुल नौकरियों में गिग वर्क की हिस्सेदारी 6.7% हो जाएगी।

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि डिलीवरी कंपनियों और अन्य प्लेटफॉर्म्स को अपने वर्कर्स की ट्रेनिंग और एसेट्स (जैसे वाहन या अन्य जरूरी उपकरण) में निवेश करना चाहिए। अक्सर पैसों की कमी और संसाधनों के अभाव में ये वर्कर्स स्किल्ड जॉब्स की तरफ नहीं बढ़ पाते।

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