महंगे प्रीमियम और मिस-सेलिंग का असर, परिपक्वता से पहले ही टूट रहीं बीमा पॉलिसियां

मुंबई- प्रीमियम महंगा होने और पॉलिसियों को गलत वादे के साथ बेचने के कारण पॉलिसीधारक अब तेजी से परिपक्वता से पहले ही बीमा पॉलिसी को सरेंडर कर रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की हालिया जारी वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के मुताबिक, कभी-कभी मिलने वाला रिटर्न वादे के मुताबिक नहीं होता है। कई बार और भी कारणों से पॉलिसी फायदेमंद नहीं लगती है। इस वजह से सरेंडर में तेजी आ रही है।

भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडाई) कई वर्षों से इस समस्या पर ध्यान दिला रहा है। इसकी हालिया जारी रिपोर्ट इस बात को दोहराती है कि जीवन बीमा क्षेत्र में गलत तरीके से बेची जाने वाली पॉलिसी एक बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है। इसमें कहा गया है कि बीमा उत्पादों को नियमों, शर्तों या उपयुक्तता के बारे में उचित जानकारी दिए बिना बेचा जा रहा है। लेकिन गलत तरीके से बेची जाने वाली पॉलिसी से परे नए नियामक आंकड़े एक गहरी, अधिक संरचनात्मक समस्या की ओर इशारा करते हैं।

वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में कुछ चिंताजनक जानकारियां और आंकड़े सामने आए हैं। ये दर्शाते हैं कि भारत की बीमा प्रणाली कैसे काम करती है और वास्तव में इससे किसे लाभ मिलता है। जीवन बीमा भुगतान में तेज वृद्धि हो रही है। पहली नजर में यह एक स्वस्थ बीमा क्षेत्र का संकेत प्रतीत हो सकता है जो अपने वादों को पूरा कर रहा है। हालांकि, सच्चाई कुछ अधिक चिंताजनक है। बीमा कंपनियों की ओर से भुगतान किए गए कुल लाभ 2020-21 में लगभग 4 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 6.3 लाख करोड़ रुपये हो गए। हालांकि, इन भुगतानों का एक बढ़ता हुआ हिस्सा पॉलिसी परिपक्वता से नहीं, बल्कि समय से पहले पॉलिसी बंद करने, सरेंडर करने और निकासी से आ रहा है। इसका मतलब अधिक लोग समय से पहले पॉलिसी को नुकसान पर सरेंडर कर रहे हैं।

37 फीसदी लोगों ने समय से पहले किया सरेंडर

आंकड़ों से पता चलता है कि बीमा कंपनियों ने 37 फीसदी का भुगतान (पेआउट) समय से पहले सरेंडर और निकासी वाली पॉलिसी के एवज में किया है। मृत्यु दावों के एवज में केवल 7.5 फीसदी पेआउट दिया गया है। सिर्फ 35 फीसदी पॉलिसीधारक ऐसे हैं जो मैच्योरिटी तक पॉलिसी को बनाए रखते हैं।

बैंक एजेंट के जाल में फंसे पॉलिसीधारक

जानकारों के मुताबिक, कमीशन को बढ़ाने वाले बैंकों और एजेंटों के जाल में पॉलिसीधारक फंस रहे हैं। कमीशन पर हालिया आंकड़े इस समस्या के मजबूत प्रमाण देते हैं। खासकर निजी क्षेत्र की कंपनियों में, चाहे वे जीवन बीमा हों या गैर-जीवन बीमा। पारंपरिक जीवन बीमा उत्पाद एक जाल की तरह बना है। बीमा करने वाले एजेंट ग्राहकों को पहले वर्ष में फंसाते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं। उच्च सरेंडर दरें आकस्मिक नहीं हैं। ये कमीशन प्रधान वितरण मॉडल से गहराई से जुड़ी हुई हैं, जो दीर्घकालिक ग्राहक परिणामों की तुलना में बिक्री मात्रा को प्राथमिकता देता है।

अन्य बीमा क्षेत्रों की स्थिति और भी बदतर

जीवन बीमा के अलावा अन्य बीमा क्षेत्रों की स्थिति और भी बदतर है। खासकर स्वास्थ्य क्षेत्र में, जहां बीमा का आधार बेहद खराब है और दावा प्रक्रिया इतनी जटिल है कि पॉलिसीधारक निराश और असंतुष्ट रहते हैं। बीमा कंपनियों के खर्च पैटर्न से सरकारी और निजी क्षेत्र की कंपनियों में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।

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