रेगुलर म्यूचुअल फंड में कमीशन की मार, 10 साल में निवेशकों की वेल्थ 25–50% तक घट रही

मुंबई- रेगुलर म्युचुअल फंड स्कीम्स में छिपे कमीशन लंबे समय में निवेशकों की वेल्थ को काफी हद तक घटा सकते हैं, भले ही पोर्टफोलियो समान ही क्यों न हो। फाइनैंशियल प्लानिंग फर्म 1 Finance के नए रिसर्च में यह सामने आया है कि एक दशक तक इक्विटी म्युचुअल फंड में निवेश करने वाले निवेशकों के लिए ज्यादा लागत (high costs) का असर जितना दिखता है, उससे कहीं ज्यादा गंभीर हो सकता है।

स्टडी के मुताबिक, 80 फीसदी से ज्यादा इक्विटी म्युचुअल फंड स्कीम्स में रेगुलर प्लान में निवेश करने वाले निवेशकों की संपत्ति 10 साल की अवधि में उसी स्कीम के डायरेक्ट प्लान में निवेश करने वालों की तुलना में कम से कम 25 फीसदी तक कम रही। रेगुलर और डायरेक्ट प्लान एक ही तरह के पोर्टफोलियो में निवेश करते हैं। दोनों के बीच असली फर्क लागत का होता है। रेगुलर प्लान में डिस्ट्रीब्यूटर को दिया जाने वाला कमीशन शामिल होता है, जो टोटल एक्सपेंस रेशियो (TER) में जुड़ा रहता है। यह अंतर भले ही एक साल में छोटा लगे, लेकिन समय के साथ यह लगातार कंपाउंड होता रहता है।

स्टडी के मुताबिक, लगभग हर पांच में से एक इक्विटी स्कीम में 10 साल की अवधि के दौरान रेगुलर और डायरेक्ट प्लान के बीच वेल्थ का अंतर 50 फीसदी से ज्यादा रहा, और इसकी वजह सिर्फ ज्यादा खर्च रही। रिसर्च यह भी बताती है कि रिटर्न में गिरावट समय के साथ धीरे-धीरे नहीं, बल्कि तेज रफ्तार से बढ़ती जाती है। शॉर्ट टर्म निवेश में यह अंतर संभालने लायक लग सकता है, लेकिन लॉन्ग टर्म निवेश में लागत का यह फर्क नजरअंदाज करना मुश्किल हो जाता है।

मध्यम अवधि में भी इसका असर साफ नजर आता है। पांच साल की अवधि में जिन स्कीमों का एनालिसिस किया गया, उनमें से आधे से ज्यादा में रेगुलर प्लान के निवेशकों की संपत्ति डायरेक्ट प्लान की तुलना में कम से कम 15 फीसदी तक घट गई। खास बात यह है कि स्टडी के मुताबिक यह अंतर फंड के प्रदर्शन या कैटेगरी के चुनाव की वजह से नहीं है, बल्कि ज्यादा और बार-बार लगने वाली लागत के कारण है, जो हर साल रिटर्न पर लगातार दबाव डालती रहती है।

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