चांदी के प्रसंस्करण को बढ़ावा देकर आयात में विविधता लाए भारत, इससे खत्म होगी निर्भरता
मुंबई- चांदी न केवल एक कीमती धातु है, बल्कि औद्योगिक और ऊर्जा परिवर्तन के लिए एक महत्वपूर्ण घटक भी है। भारत को दीर्घकालिक विदेशी खनन आपूर्ति सुनिश्चित करके, घरेलू रिफाइनिंग और रिसाइकल को बढ़ावा देकर आयातित तैयार चांदी पर निर्भरता कम करने की जरूरत है। साथ ही, आयात स्रोतों में विविधता लाकर इसके प्रसंस्करण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। जीटीआरआई ने कहा, चीन विश्व में चांदी का सबसे बड़ा प्रोसेसर है।
जीटीआरआई की रिपोर्ट के अनुसार, चीन वैश्विक स्तर पर 6.3 अरब डॉलर के चांदी अयस्क और गाढ़े घोल के आयात में से लगभग 5.6 अरब डॉलर का आयात करता है। यह घरेलू स्तर पर रिफाइनिंग करता है और इलेक्ट्रॉनिक्स, चिकित्सा उपकरणों और सौर पैनलों में जमाए गए उच्च मूल्य वाली चांदी का निर्यात करता है। इसके विपरीत भारत ने 2024 में लगभग 6.4 अरब डॉलर की रिफाइंड चांदी का आयात किया, जो वैश्विक व्यापार का 21.4 फीसदी है। इस प्रकार, भारत तैयार चांदी का दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, न कि प्रोसेसर।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के मुताबिक, 2024-25 में भारत ने केवल 47.8 करोड़ डॉलर मूल्य के चांदी उत्पादों का निर्यात किया। लेकिन आयात 4.83 अरब डॉलर का किया। यानी देश की निर्भरता आयात पर ज्यादा है। 2025 में यह निर्भरता और भी बढ़ गई। अकेले अक्तूबर में आयात बढ़कर 2.7 अरब डॉलर हो गया, जो 2024 की तुलना में 529 फीसदी अधिक है। नवंबर में यह 1.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह 126 फीसदी की वृद्धि है।
जनवरी-नवंबर में 8.5 अरब डॉलर का आयात
जनवरी-नवंबर के दौरान देश का कुल आयात 8.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया। पूरे वर्ष के लिए अनुमान 9.2 अरब डॉलर है। 2024 की तुलना में लगभग 44 फीसदी अधिक है। अप्रैल-अक्तूबर के दौरान 5.94 अरब डॉलर मूल्य की चांदी का आयात किया। भारत को चांदी को महज एक कीमती वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि इसे अपनी खनिज और स्वच्छ ऊर्जा रणनीति में एकीकृत करना चाहिए।
चीन ने निर्यात नियंत्रण मजबूत किया
भारत का आयात विविधीकरण महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन ने निर्यात नियंत्रण को कड़ा कर दिया है। 1 जनवरी, 2026 से चांदी के निर्यात को लाइसेंस आधारित प्रणाली में स्थानांतरित कर दिया है। नए नियमों के तहत केवल अनुमोदित कंपनियां ही चांदी का निर्यात कर सकती हैं। प्रत्येक खेप के लिए सरकारी प्राधिकरण की आवश्यकता होती है। हालांकि, यह पूर्णतः निर्यात प्रतिबंध नहीं है, लेकिन इसने वैश्विक आपूर्ति संबंधी चिंताओं को बढ़ा दिया है और कीमतों में नई अस्थिरता पैदा कर दी है।

