सख्त ब्याज दर नीतियों से अर्थव्यवस्था की विकास पर पड़ सकता है जोखिम

मुंबई। मौद्रिक नीतियों को लगातार सख्त बनाए रखने से देश की अर्थव्यवस्था पर जोखिम पड़ सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के दर पैनल के दो बाहरी सदस्यों ने कहा, भारत की अर्थव्यवस्था को उच्च वृद्धि बनाए रखने के लिए ब्याज दर में कटौती की जरूरत है।

पैनल के दो सदस्यों आशिमा गोयल और जयंत वर्मा ने तर्क दिया कि अब तक खाद्य कीमतों के झटके ने महंगाई के दबावों को नहीं जोड़ा है। दोनों ने पिछली मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) बैठक में बेंचमार्क दर में कटौती के लिए मतदान किया था। जबकि चार सदस्यों ने रेपो दर को 6.5 फीसदी पर अपरिवर्तित रखने के लिए मतदान किया था।

एमपीसी के तीसरे बाहरी सदस्य शशांक भिड़े ने स्वीकार किया कि नीति निर्धारण में विकास एक महत्वपूर्ण पैमाना है। तीनों सदस्यों के विचार अर्थव्यवस्था में गति को लेकर नीति निर्माताओं के बीच बढ़ती चिंता को दर्शाते हैं। भले ही महंगाई आरबीआई के 4 फीसदी के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है।

वर्मा ने कहा, मौद्रिक नीति आम तौर पर तीन से पांच तिमाहियों के अंतराल के साथ काम करती है। इसका मतलब है कि उच्च ब्याज दरें अगले साल विकास को प्रभावित करेंगी। वित्त वर्ष 2023-24 की तुलना में मैं 2024-25 के बारे में ज्यादा चिंतित हूं। अब जब हम 2024-25 में हैं, तो मैं 2025-26 के बारे में अधिक चिंतित हूं। 2023-24 मं मजबूत पकड़ वाली वृद्धि जो हमने देखी है, वह इन चिंताओं को कम करने के लिए बहुत कम है।

गोयल ने कहा, हमने खाद्य कीमतों के झटकों का असर देखने के लिए एक साल तक इंतजार किया है। अब आगे बढ़ने का समय है। खाद्य कीमतों के झटके के कारण महंगाई दर आरबीआई के चार फीसदी के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। यहां तक कि ब्याज दर में 0.25 फीसदी की कटौती के साथ भी मौद्रिक नीति महंगाई को लक्ष्य तक लाने की दिशा में अवस्फीतिकारी बनी रहेगी।

भिड़े ने कहा कि वह तब तक इंतजार करना पसंद करेंगे जब तक महंगाई लक्ष्य के अनुरूप न हो जाए। लेकिन उच्च वास्तविक ब्याज दरें विकास के लिए सही नहीं हैं। उच्च खाद्य मुद्रास्फीति का असर तत्काल भले नहीं दिखे, लेकिन इसका मजदूरी दरों, सब्सिडी और उन क्षेत्रों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है, जहां खाद्य उत्पाद कच्चे माल के रूप में हैं।

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