ग्राहकों को बताते हैं डिजिटल होइए, खुद सरकारी बैंक के आधे अधिकारी फेल

मुंबई- डेलॉयट इंडिया द्वारा किए गए अध्ययन से पता चला है कि भारतीय सरकारी बैंकों (PSB) के आधे से ज्यादा बड़े अधिकारियों को अपने बैंकों को तेजी से बदलने (transform) के लिए डिजिटल बनने की ज़रूरत है। इस अध्ययन में 100 से ज्यादा बैंक अधिकारियों की राय ली गई। अध्ययन में पाया गया कि बैंकों में तेजी से डिजिटल तरीके अपनाए जा रहे हैं, लेकिन हर स्तर पर अधिकारियों को इसे लागू करने की समझ होनी चाहिए।

अध्य्यन में कहा गया है, PSB यानी पब्लिक सेक्टर के बैंक आजकल तीन चीजों को बदल रहे हैं, वो भी डिजिटल तरीके से! पहला, वो अब ग्राहकों तक बैंक के प्रोडक्ट और सेवाएं पहुंचाने के नए रास्ते अपना रहे हैं। दूसरा, वो अपने ऑपरेशन और सेवाओं को आसान बना रहे हैं ताकि आप आसानी से लेनदेन कर सकें और बैंक से मदद ले सकें।

तीसरा, वो आपके पैसों और जानकारी की सुरक्षा के लिए साइबर सुरक्षा को मजबूत कर रहे हैं। लेकिन ये सब करते हुए वे सामाजिक जिम्मेदारियों को भी नहीं भूल रहे हैं, जैसे कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को बैंकिंग से जोड़ना। कुल मिलाकर, ये बदलाव PSB को और बेहतर, ग्राहक-पसंद और समाज के लिए काम करने वाले बनाएंगे।

अध्य्यन में कहा गया है, PSB तेजी से बदल रहे हैं मगर उनके लीडर्स के लिए ये बदलाव चुनौती बन गए हैं। एक तरफ बैंकों को जल्दी बदलना है वहीं दूसरी तरफ उन्हें अपने काम करने के तरीकों को भी बदलना है ताकि वो डिजिटल बन सकें। पर असली दिक्कत ये है कि PSB का काम बहुत बड़ा और जटिल होता है, जिसे बदलना और संभालना मुश्किल है।

दिक्कत यहीं नहीं खत्म होती, बैंकों में ऊपर के अफसर यानी सीईओ और बाकी बड़े अधिकारी ज्यादातर रोज़ के कामों में उलझे रहते हैं और नए डिजिटल तरीकों को अपनाने में थोड़ा पीछे रह जाते हैं। तो कुल मिलाकर, सरकारी बैंकों के अधिकारियों को इन मुश्किलों को पार करने के लिए नए हुनर सीखने होंगे और काम करने के नए तरीके अपनाने होंगे, तभी वो डिजिटल दौर में सफल हो पाएंगे।

सरकारी बैंकों के अधिकारियों के लिए ये बदलाव लाना आसान नहीं है। डेलॉयट इंडिया के मुताबिक, उन्हें अब और ज्यादा चुस्त होना होगा। नए ट्रेंड को जल्दी समझना और उन्हें अपने बैंक में लागू करना सीखना होगा। हालांकि, इसका ये मतलब नहीं कि उन्हें कोडिंग सीखनी होगी। असली जरूरत है कि वो पूरे डिजिटल बदलाव का नेतृत्व कर सकें और उसे अपनाएं।

इसके लिए उन्हें सिर्फ बैंक के अंदरूनी कामकाज से नहीं बल्कि बाजार के बदलावों, ग्राहकों की जरूरतों और सरकारी नियमों को भी समझना होगा। सरकारी बैंकों के अधिकारियों में डिजिटल बदलाव को लेकर काफी गैप है। वो न तो नए डिजिटल ट्रेंड को समझ पा रहे हैं और न ही बाजार के हिसाब से खुद को बदल पा रहे हैं। साथ ही ये स्टार्टअप्स से होने वाले खतरों को भी नजरअंदाज कर रहे हैं।

दिलचस्प बात ये है कि अध्ययन में ये भी पाया गया कि बैंक में जूनियर पद वाले कर्मचारी डिजिटल बदलाव को लेकर काफी उत्साहित हैं। वो रिस्क लेने और पुराने तरीकों को बदलने के लिए भी तैयार हैं। वहीं दूसरी तरफ मिडिल मैनेजमेंट नए आइडियाज को तो अपना लेता है लेकिन खुद से कोई नया नियम बनाने में हिचकिचाता है।

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