अनिल अंबानी की बढ़ी मुश्किल, डीएमआरसी से 8000 करोड़ का मामला खारिज

मुंबई- भारी कर्ज में डूबे दिग्गज कारोबारी अनिल अंबानी की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। दिल्ली मेट्रो से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने डीएमआरसी को राहत दी है। मध्यस्थता पंचाट ने अनिल अंबानी के स्वामित्व वाली रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की मेट्रो यूनिट दिल्ली एयरपोर्ट मेट्रो एक्सप्रेस प्राइवेट लिमिटेड (DAMEPL) के पक्ष में फैसला दिया था। इस मामले में डीएमआरसी को DAMEPL को 8,000 करोड़ रुपये देने को कहा गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने डीएमआरसी को राहत दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले को बरकरार रखा। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) के खिलाफ आर्बिट्रेरल अवॉर्ड पेटेंट इलैगिलिटी से ग्रस्त था।

चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली बेंच ने कहा कि डीएमआरसी द्वारा जमा की गई राशि वापस कर दी जाएगी। याचिकाकर्ता द्वारा जबरदस्ती कार्रवाई के हिस्से के रूप में भुगतान की गई किसी भी राशि को वापस करना होगा। डीएमआरसी और डीएएमईपीएल ने 2008 में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से सेक्टर 21 द्वारका तक 30 वर्षों के लिए एयरपोर्ट मेट्रो एक्सप्रेस लाइन को डिजाइन, स्थापित, कमीशन, संचालित और बनाए रखने के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।

डीएमआरसी ने सभी सिविल स्ट्रक्चर का निर्माण किया जबकि सिस्टम वर्क डीएएमईपीएल के पास था। जुलाई, 2012 में वायाडक्ट में कुछ कमियों पाए जाने के बाद डीएएमईपीएल ने ऑपरेशन सस्पेंड कर दिया और डीएमआरसी को समस्या को ठीक करने के लिए नोटिस दिया।

अक्टूबर 2012 में, DAMEPL ने टर्मिनेशन नोटिस दिया। अधिकारियों ने नवंबर 2012 में इस लाइन का निरीक्षण किया और जनवरी 2013 में ऑपरेशन बहाल करने के लिए हरी झंडी दे दी। डीएएमईपीएल ने फिर से ऑपरेशन शुरू किया लेकिन जून 2013 में पांच महीने के भीतर ही परियोजना को छोड़ दिया। डीएमआरसी ने आर्बिटेशन क्लॉज का सहारा लिया।

मध्यस्थता पंचाट ने DAMEPL के पक्ष में फैसला सुनाया और DMRC को 2017 में 2,782.33 करोड़ रुपये का भुगतान करने को कहा। अनिल अंबानी के नेतृत्व वाली कंपनी सुप्रीम कोर्ट चली गई। साल 2021 में, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि मध्यस्थता पंचाट के फैसलों को चुनौती नहीं दी जा सकती और उसने अवॉर्ड को बरकरार रखा। इस फैसले के बाद ही डीएमआरसी ने क्यूरेटिव याचिका दायर की, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 10 अप्रैल, 2024 को स्वीकार कर लिया।

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