भारत के गांवों के लोग 1,373 रुपये में कर रहे हैं पूरा महीना का गुजारा

मुंबई- प्रति व्यक्ति मासिक खर्च के हिसाब से गांवों में जो सबसे निचले 5 फीसदी लोग हैं, वे 1,373 रुपये महीने में गुजारा कर रहे हैं। शहरों में 2,001 रुपये रहा है। सबसे ऊपर के 5 फीसदी लोगों के लिए गांवों में 10,501 रुपये खर्च रहा। शहरों में यह 20,824 रुपये रहा।

देश में लोग भोजन पर कम और कपड़े तथा मनोरंजन आदि पर ज्यादा पैसे खर्च कर रहे हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी मंत्रालय (एनएसओ) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय परिवारों का घरेलू खर्च पिछले 10 वर्षों में दोगुना से ज्यादा हो गया है। अगस्त 2022 से जुलाई 2023 के बीच किए गए सर्वेक्षण के आंकड़ों में यह बात कही गई है। हालांकि, सरकार ने 2017-18 के सर्वे का नतीजा आंकड़ों में गड़बड़ी की बात कहकर जारी नहीं किया था।

आंकड़ों के अनुसार, 2022-23 में शहरी क्षेत्रों में औसत मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग खर्च (एमपीसीई) बढ़कर अनुमानित 6,459 रुपये हो गया। 2011-12 में यह 2,630 रुपये था। ग्रामीण भारत में खर्च 1,430 रुपये से बढ़कर अनुमानित 3,773 रुपये हो गया है। भारतीय परिवार खाद्य पदार्थों पर प्रतिशत के रूप में कम खर्च कर रहे हैं। कपड़े, टीवी और मनोरंजन जैसे माध्यमों पर ज्यादा खर्च कर रहे है। यह आंकड़ा कुल 2,61,746 घरों के सर्वे से जुटाया गया है। इसमें 1,55,014 घर गांवों के और 1,06,732 घर शहरी इलाकों के हैं।

गांवों में मासिक खपत में भोजन का हिस्सा घटकर 46.4 फीसदी रहा है। 2011-12 में यह 53 फीसदी था। गैर-खाद्य खपत 47 फीसदी से बढ़कर 53.6 फीसदी हो गई। शहरी क्षेत्रों में भोजन की हिस्सेदारी 42.6 फीसदी से घटकर 39.2 फीसदी हो गई। गैर-खाद्य हिस्सेदारी 57.4 फीसदी से बढ़कर 60.8 फीसदी हो गई। 2010-11 में शहरों में औसत एमपीसीई गांवों में खर्च से 84 फीसदी अधिक था। 2022-23 में यह अंतर घटकर करीब 71 फीसदी अधिक रह गया है।

सर्वे में कुल खर्च में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी घटने और दूसरी चीजों की बढ़ने का मतलब है कि इसके आधार पर कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स की नई सीरीज तैयार करने में मदद मिलेगी। अभी इस इंडेक्स में खाने-पीने की चीजों का वजन शिक्षा, मेडिकल या दूसरे आइटम्स से कहीं ज्यादा है। इनके दाम में कोई भी उतार-चढ़ाव महंगाई के आंकड़ों पर बड़ा असर डालता है।

गांवों में खाने-पीने पर प्रति व्यक्ति मासिक खर्च 1750 और शहरों में 2530 रुपये रहा। खाद्य सामग्री में सबसे ज्यादा खर्च पेय और बाहर से खरीदे गए पके हुए आइटम्स का रहा है। गांवों में दूध और इससे बनी चीजों पर प्रति व्यक्ति औसत मासिक खर्च 314 रुपये और अनाज पर 185 रुपये रहा।

शहरों में इन पर खर्च 466 और 235 रुपये रहा। लेकिन पेय और प्रोसेस्ड सामग्री पर खर्च इनसे भी ज्यादा हो गया है। गांवों में इन पर महीने का प्रति व्यक्ति औसत खर्च 363 रुपये और शहरों में 687 रुपये है। गांवों में पेय और प्रोसेस्ड खाने पर खर्च 2011-12 में कुल एमपीसीई का 7.9 फीसदी था, जो 2022-23 में 9.6 फीसदी हो गया। शहरों में यह 9 फीसदी से बढ़कर 10.6 फीसदी हो गया है।

शहरों में गैर-खाद्य सामग्री पर प्रति व्यक्ति मासिक खर्च 3,929 रुपये रहा। कुल खर्च में इसका हिस्सा 61% रहा। गांवों में गैर-खाद्य के अलावा सर्वाधिक 285 रुपये खर्च यात्रा पर, 269 रुपये मेडिकल पर। सुविधाओं पर शहरों में मासिक खर्च 555 रुपये और ड्यूरेबल पर 424 रुपये रहा

खर्च में सिक्किम आगे, छत्तीसगढ़ पीछे          

राज्यगांवशहर
सिक्किम             7,73112,105
छत्तीसगढ़2,4664,483
दिल्ली   6,5768,217
यूपी   3,1914,768
महाराष्ट्र       4,0106,657
बिहार 3,3844,768

 (आंकड़े रुपये में। प्रति व्यक्ति मासिक औसत खर्च)

32022-23 के सर्वे के मुताबिक, रूरल एरिया में ST के लिए ऐवरेज MPCE 3016 रुपये और शहरी इलाकों में 5414 रुपये है। SC के लिए गुजर-बसर पर प्रति व्यक्ति मासिक खर्च का आंकड़ा गांवों में 3474 रुपये और 5307 रुपये का है। OBC के लिए यह 3848 रुपये और 6177 रुपये है। इनके अलावा बाकी लोगों के लिए गांवों में औसत MPCE 4392 रुपये और शहरों में 7333 रुपये है।

पहले के कंजम्पशन एक्सपेंडिचर सर्वे से इस बार एक अलग खास काम हुआ है। विभिन्न समाज कल्याण योजनाओं के जरिए लोगों को खाने-पीने की चीजों से लेकर साइकल, मोबाइल फोन, लैपटॉप, स्कूटी वगैरह जो कुछ भी मुफ्त मिलता है, उसका असर परंपरागत खर्च में जोड़कर प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग खर्च का एक अलग आंकड़ा जारी किया गया है। हालांकि इसमें मुफ्त मिलने वाली स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं का असर शामिल नहीं किया गया है।

इस तरीके से ग्रामीण इलाकों में ऐवरेज MPCE 3860 रुपये और शहरी इलाकों में 6521 रुपये रहा। इसमें रूरल एरिया में फूड आइटम्स पर औसत खर्च 1832 रुपये और शहरों में 2589 रुपये रहा। नॉन-फूड आइटम्स पर खर्च 2028 रुपये और 3932 रुपये है। इसका मतलब यह है कि समाज कल्याण की योजनाओं के चलते कंजम्पशन ग्रोथ दिख रही है।

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