धोखाधड़ी के खिलाफ 15 साल लड़कर एक्सिस बैंक से लिए 74 लाख रुपये

मुंबई- धोखाधड़ी के एक मामले में पांच लोगों ने 15 साल कानूनी लड़ाई लड़कर एक्सिस बैंक से 73.93 लाख रुपये वापस ले लिए हैं। राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने चेक धोखाधड़ी मामले में मुआवजे सहित सामूहिक राशि का भुगतान करने का आदेश दिया है। 

24 मई 2008 को एक पीड़ित के एक्सिस बैंक खाते में 11.93 लाख रुपये थे। वह जब कुछ पैसे निकालने बैंक पहुंचा तो बैंक ने बताया कि खाते में 10,000 रुपये ही है। बैंक अधिकारी ने बताया कि गुरविंदर सिंह नाम के किसी व्यक्ति ने एक चेक दिया और खाते से 11.83 लाख रुपये निकाल लिए। खाताधारक ने दावा किया कि उसे ऐसे किसी व्यक्ति के बारे में जानकारी नहीं है।

इसी तरह की चेक धोखाधड़ी की घटनाएं चार अन्य व्यक्तियों के साथ हुईं। इन सभी के खाते एक्सिस बैंक की एक ही शाखा में थे। चारों ने 2008 में एक्सिस बैंक में बैंक खाता खोला था। चूंकि पांचों शिकायतकर्ताओं के तथ्य और घटनाएं एक जैसी थी, इसलिए उपभोक्ता फोरम ने सभी पीड़ितों के लिए एक संयुक्त सामान्य आदेश जारी किया। इस जवाब में बैंक ने संदिग्ध गुरविंदर सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। धोखाधड़ी की जांच के लिए बैंक ने एक आंतरिक जांच समिति भी गठित की थी। 

यह मामला 14 जुलाई, 2008 को हुई बैठक में बड़े मूल्य के धोखाधड़ी की निगरानी के लिए एक्सिस बैंक की विशेष समिति के समक्ष रखा गया। जांच में पता चला कि खाते खोलने में शामिल कर्मचारियों ने तय मानदंडों और प्रक्रियाओं का पालन किया था। सभी खातों में केवाईसी था। बैंक ने कहा, ऐसे में इसके लिए किसी भी गलत इरादे को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। बैंक ने तर्क दिया कि उसने सभी दायित्व पूरा कर लिया है। इसमें तुरंत एफआईआर दर्ज करने, मामले की जांच करने और आरबीआई को रिपोर्ट करने जैसे दायित्व का निर्वहन किया है। शिकायतकर्ता एक्सिस बैंक की कार्रवाई से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने जिला उपभोक्ता फोरम में बैंक के खिलाफ मामला दायर किया। 

चेक पर हस्ताक्षर का मिलान शिकायतकर्ता के हस्ताक्षर से किया गया। इसमें हस्ताक्षर संबंधित चेक के हस्ताक्षर से अलग थे। जिला उपभोक्ता फोरम ने तथ्यों और सबूतों को देखने के बाद राय दी कि बैंक की गलती है। उन्हें मुआवजे के साथ धोखाधड़ी से निकाली गई राशि का भुगतान करना चाहिए। साथ ही मानसिक उत्पीड़न के लिए 2 लाख रुपये और मुकदमेबाजी लागत के लिए 5,000 रुपये भी देने होंगे। फिर एक्सिस बैंक ने राज्य उपभोक्ता फोरम में मामला दायर किया। 

आयोग ने माना कि एक्सिस बैंक की ओर से सेवा देने में कमी थी। अधिकारी सावधानी के साथ कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहे। राज्य आयोग ने बैंक को आदेश दिया कि वह प्रत्येक पीड़ित को पूरी राशि का भुगतान करे। प्रत्येक को मुआवजा भी दिया जाए। धोखाधड़ी से निकाली गई सामूहिक राशि 68.93 लाख रुपये थी और मुआवजा 5 लाख रुपये था। 

राज्य उपभोक्ता आयोग में केस हारने के बाद बैंक ने 2015 में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक विशेष अनुमति याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने 30 जनवरी, 2018 को मामले को फिर से आयोग के पास भेज दिया।बैंक ने आरोप लगाया कि शिकायतकर्ता और मुख्य संदिग्ध बैंक के खिलाफ घोटाले में एक साथ शामिल हो सकते हैं। 

बैंक का दावा था कि इन खातों को खोलने की तारीख से एक महीने में सभी धोखाधड़ी वाले लेनदेन हुए हैं। जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रतिवादियों और गुरविंदर सिंह ने बैंक को धोखा देने के लिए एक-दूसरे से हाथ मिलाया है। साथ ही सुप्रीमकोर्ट के आदेश देने तक गुरविंदर सिंह को किसी भी पक्ष में आरोपी नहीं बनाया गया था। 

राज्य उपभोक्ता आयोग में केस हारने के बाद बैंक ने एनसीडीआरसी में अपील दायर की। एनसीडीआरसी ने पिछले साल दिसंबर में सुनवाई में पाया कि राज्य आयोग के पारित आदेश में कोई गलती नहीं है। ऐसा लगता है कि याचिकाकर्ता व बैंक ने केवाईसी ठीक से नहीं किया है। ऐसे में हम राज्य आयोग के आदेश को बरकरार रखते हैं और बैंक को खाताधारकों के नुकसान की भरपाई करनी होगी। 

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