15 लाख करोड़ के पार पहुंचा अदाणी का मार्केट कैप, कोर्ट का पक्ष में फैसला 

मुंबई-अडानी समूह के लिए नए साल की शुरुआत शानदार तरीके से हुई है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने अडानी-हिंडनबर्ग विवाद से जुड़ा एक अहम फैसला सुनाया, जिसके बाद अडानी समूह के सारे शेयर रॉकेट बने हुए हैं। शेयरों की इस जबरदस्त रैली से अडानी समूह का सम्मिलित मार्केट कैप आज 15 लाख करोड़ रुपये के पार निकल गया है। 

अडानी के सभी 10 शेयरों ने कारोबार की शुरुआत फायदे के साथ की। सुबह तो अडानी के कुछ शेयर 16 फीसदी तक की तेजी में थे। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद सारे शेयर ग्रीन जोन में बने रहे. दोपहर के कारोबार में अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस सबसे ज्यादा करीब 10 फीसदी की तेजी में था। 

अदाणी-हिंडनबर्ग मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से किसी एसआईटी या सीबीआई को जांच नहीं सौंपे जाने के कई कारण हैं। इसमें मुख्य रूप से हिंडनबर्ग की रिपोर्टों में जहां कोर्ट को कोई सच्चाई नहीं दिखी, वहीं सेबी की जांच की विशेषज्ञता का भी कोर्ट ने सम्मान किया। साथ ही विदेशी निवेशकों के नियमों की वैधता को भी अदालत ने बरकरार रखा। 

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय मुख्य रूप से रिपोर्टों की प्रामाणिकता और सेबी के अधिकार क्षेत्र के मूल्यांकन पर आधारित है। पीठ ने जॉर्ज सोरोस से जुड़ी ओसीसीआरपी रिपोर्ट और अडाणी समूह की ओर से शेयरों की कीमतों में कथित हेरफेर पर हिंडनबर्ग रिपोर्ट की विश्वसनीयता के बारे में संदेह व्यक्त करते हुए कहा कि इन रिपोर्टों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं किया जा सकता है और इन्हें प्रामाणिक जानकारी के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। 

सुप्रीम कोर्ट ने विदेशी निवेशकों (एफपीआई) के नियमों की वैधता को बरकरार रखा। इनका इस्तेमाल कथित तौर पर अदाणी समूह की ओर से अपने शेयरों की कीमतें बढ़ाने के लिए किया गया था। अदालत ने कहा, इन नियमों को रद्द करने का कोई ठोस आधार नहीं है। वे नियम किसी भी कानूनी कमजोरी से ग्रस्त नहीं हैं। 

सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त एसआईटी के सदस्यों के खिलाफ वकील प्रशांत भूषण की ओर से उठाए गए हितों के टकराव के आरोपों पर अदालत ने इन दावों में कोई योग्यता नहीं पाई। आरोपों को जोर-शोर से उजागर किया गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। 

मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा, सेबी के नियामक ढांचे में प्रवेश करने की इस अदालत की शक्ति सीमित है। यह बयान सेबी जैसे नियामक की अपने क्षेत्र में स्वायत्तता और विशेषज्ञता का सम्मान करने के लिए अदालत के दृष्टिकोण को रेखांकित करता है। अदालत ने विशेषज्ञ समिति के सदस्यों की ओर से हितों के टकराव के संबंध में याचिकाकर्ताओं की दलीलों को भी खारिज कर दिया। इसने फिर से पुष्टि की कि ओसीसीआरपी जैसी असत्यापित तीसरे पक्ष की रिपोर्टों पर निर्भरता को कानूनी कार्यवाही में सबूत के रूप में नहीं माना जा सकता है। 

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