चीन की हालत हुई और खराब, बैंकों के बाहर लगी पैसे निकालने की लाइन 

मुंबई- दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी इकॉनमी वाले देश चीन में सबकुछ ठीक नहीं है। देश का रियल एस्टेट संकट लगातार गहराता जा रहा है। चीन की जीडीपी में रियल एस्टेट और उससे जुड़ी गतिविधियों की करीब 25 परसेंट हिस्सेदारी है। माना जा रहा है कि यह संकट पूरी इकॉनमी को डुबो सकता है। रियल एस्टेट कंपनियां कर्ज के भुगतान में डिफॉल्ट कर रही हैं जिससे बैंकिंग सेक्टर पर भी खतरा मंडरा रहा है। 

लोगों को अपने पैसे डूबने का डर लग रहा है और वे बैंकों से अपना पैसा निकाल रहे हैं। देश की सबसे बड़ी रियल एस्टेट कंपनी एवरग्रेंड दिवालिया हो चुकी है जबकि हाल में एक और बड़ी कंपनी कंट्री गार्डन ने डेट पेमेंट में डिफॉल्ट किया है। देश का रियल एस्टेट इंडेक्स अपने उच्चतम स्तर से 85 परसेंट गिर चुका है। इससे चीन में मंदी की आशंका तेज हो गई है। 

इस संकट की शुरुआत तो कुछ साल पहले ही हो गई थी जब एवरग्रेंड ने पेमेंट में डिफॉल्ट किया था। हाल में इसके चेयरमैन को पुलिस कस्टडी में भेजा गया है और शेयरों की खरीद फरोख्त सस्पेंड  कर दी गई है। एवरग्रेंड दुनिया में सबसे ज्यादा कर्ज में डूबी रियल एस्टेट कंपनी है। इसका असर दूसरी रियल एस्टेट कंपनियों पर भी दिखा। देखते-देखते चीन का रियल एस्टेट सेक्टर गहरे संकट में आ गया। चीन की  इकॉनमिक ग्रोथ में इस सेक्टर की अहम भूमिका है। यही वजह है कि इस संकट के कारण चीन की पूरी  इकॉनमी के डूबने का खतरा है। सेमीकंडक्टर चिप की लड़ाई में चीन ने निकाला नया हथियार, दुनिया में मच सकता है हाहाकार 

चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी इकॉनमी है और करीब दो दशक से दुनिया की फैक्ट्री बनी हुई है। दुनियाभर के बाजार चीनी माल से पटे हुए हैं। दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियां चीन में सामान बना रही हैं। लेकिन पिछले  कुछ समय से चीन की इकॉनमी के बारे में डराने वाली खबरें आ रही हैं। देश का रियल एस्टेट मार्केट संकट में  है, एक्सपोर्ट गिर रहा है, बेरोजगारी चरम पर है और ग्रोथ धीमी पड़ गई है। भविष्य की चिंता के कारण लोग  पैसे खर्च करने से बच रहे हैं। ऐसे में विदेशी कंपनियां वहां से अपना बोरिया-बिस्तर समेट रही हैं और अमेरिका  का साथ तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है। 

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि चीन की इस समस्या के दुनिया के लिए क्या मायने हैं। इससे मल्टीनेशनल कंपनियों, उनके वर्कर्स और कई ऐसे लोगों के भी प्रभावित होने की आशंका है जिनका चीन के प्रत्यक्ष रूप से कोई लेनादेना नहीं है। अगर चीन के लोग अपने खर्च में कटौती की तो इससे ग्लोबल इकॉनमी भी प्रभावित होगी। जाहिर है कि इससे उन कंपनियों पर असर पड़ेगा जो चीन को सप्लाई करती हैं। ऐपल, फॉक्सवैगन और बरबरी जैसी सैकड़ों ग्लोबल कंपनियों की कमाई का मुख्य जरिया चीन का बाजार है। अगर चीन के लोग कम खर्च करेंगे तो इन कंपनियों का नुकसान होगा। इससे इन कंपनियों के सप्लायर्स और वर्कर्स पर असर होगा। 

दुनिया में एक-तिहाई ग्रोथ के लिए चीन जिम्मेदार है और वहां किसी भी तरह की सुस्ती का असर पूरी दुनिया पर दिखाई देगा। अमेरिका की क्रेडिट एजेंसी फिच ने पिछले महीने कहा था कि चीन में सुस्ती से ग्लोबल ग्रोथ  की संभावनाओं पर ग्रहण लग सकता है। एजेंसी ने 2024 में पूरी दुनिया के ग्रोथ अनुमान को घटा दिया था।  हालांकि कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस आइडिया को बढ़ाचढ़ाकर पेश किया जाता है कि चीन  दुनिया की समृद्धि का इंजन है। 

यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफर्ड के चाइना सेंटर में इकनॉमिस्ट जॉर्ज मैग्नस ने कहा कि गणित के हिसाब से देखें तो यह सही है कि ग्लोबल ग्रोथ में चीन की हिस्सेदारी करीब 40 परसेंट है। लेकिन इस ग्रोथ से किसे फायदा हो रहा है। चीन का ट्रेड सरप्लस बहुत ज्यादा है। उसके इम्पोर्ट की तुलना में उसका एक्सपोर्ट बहुत ज्यादा है।  इसलिए चीन की ग्रोथ से उसे ही फायदा हुआ है, दुनिया को नहीं। चीन में डिमांड कमजोर होने से कीमतें कम रहेंगी। पश्चिमी देशों के लिए यह अच्छी बात है क्योंकि इससे कीमतों में गिरावट आएगी और महंगाई कम होगी। यानी शॉर्ट टर्म में दुनियाभर के लोगों को चीन के स्लोडाउन से फायदा होगा।  

जिन देशों में चीन ने निवेश किया है, उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। चीन ने अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव पर पिछले 10 साल में एक ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च किए हैं। 150 से अधिक देशों को चीन ने पैसा और टेक्नोलॉजी दी है। अगर चीन में आर्थिक समस्याएं बढ़ती हैं तो फिर वह इस निवेश से हाथ खींच सकता है। 

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