8वीं पास ने खड़ी कर दी 9 हजार करोड़ रुपये की कंपनी, अब टाटा खरीदेगी हिस्सा 

मुंबई- आपने भी कभी न कभी हल्दीराम की भुजिया या नमकीन खाई होगी। आज इस कंपनी की चर्चा एक बार फिर से हो रही है। दरअसल खबरें आ रही हैं कि हल्दीराम बिकने जा रही है। टाटा समूह की कंपनी टाटा कंज्यूमर इस कंपनी की 51 फीसदी हिस्सेदारी खरीद सकती है।  

साल 1937 में गंगा विशन अग्रवाल ने हल्दीराम की नींव रखी। छोटी सी दुकान में भुजिया, नमकीन बेचते थे। विशन अग्रवाल की मां उन्हें प्यार से हल्दीराम कहकर बुलाती थी, इसलिए उन्होंने अपने नमकीन का नाम भी ‘हल्दीराम’ ही रखा। उन्होंने नमकीन और भुजिया बनाने की कला अपनी बुआ ‘बीखी बाई’ से सीखी थी। हालांकि उन्होंने इसे बनाने में कई बदलाव किए। लोगों को उनके नमकीन का स्वाद पसंद आने लगा। उन्होंने बेसन की जगह मोठ दाल का इस्तेमाल किया, जिससे स्वाद बढ़ता चला गया और ग्राहक भी। 

भुजिया और नमकीन को लेकर उनका प्रयोग चल गया। उन्होंने अलग-अलग तरह का भुजिया बनाना शुरू किया। कोई पतला तो कोई मोटा, लेकिन जो सबसे ज्यादा हिट रहा, वो था हल्दीराम की एक दम पतली भुजिया। लोगों को उसका चटपटी और क्रिस्पी स्वाद खूब पसंद आया। लोगों को पंसद तो आ रहा था, लेकिन बाजार तक उसकी पहुंच बढ़ नहीं रही थी। बिशनजी अग्रवाल भले ही 8वीं पास थे, लेकिन उनके पास गजब की मार्केटिंग स्किल थी।  

बिजनेस को आगे ले जाने के लिए उन्होंने बीकानेर के महाराजा डूंगर सिंह के नाम पर भुजिया का नाम ‘डूंगर सेव’ रख दिया। उस वक्त हल्दीराम के नमकीन डूंगर सेव बिकना शुरू हो गया। महाराजा का नाम जुड़ने के बाद भुजिया का नाम तेजी से फैलने लगा। 

महराज का नाम जुड़ते ही हल्दीराम का भुजिया तेजी से मार्केट में फैलने लगा। उस वक्त उस नमकीन की कीमत 5 पैसा प्रति किलो थी। धीरे-धीरे हल्दीराम का भुजिया बीकानेर में पॉपुलर हो गया। काम बढ़ता चला गया। साल 1941 तक हल्दीराम की नमकीन का स्वाद बीकानेर के आसपास तक फैल चुका था। बिशनजी अग्रवाल इसे पूरे देश में फैलाना चाहते थे। एक बार वो कोलकाता में एक शादी में शामिल हुए। अपने साथ वो भुजिया लेकर गए थे। उनकी भुजिया का स्वाद उनके रिश्तेदारों और दोस्तों को काफी पसंद आया। इसके बाद उन्होंने कोलकाता में दुकान खोलने का फैसला किया।  

हल्दीराम की एक ब्रांच कोलकाता में खुल गई। कोलकाता के बाद नागपुर और फिर दिल्ली तक हल्दीराम पहुंच गया। साल 1970 में नागपुर और साल 1982 में राजधानी दिल्ली में हल्दीराम के स्टोर खुले। कारोबार के साथ-साथ विवाद भी बढ़ता रहा। हल्दीराम के बड़े बेटे सत्यनारायण ने पिता और भाई से अलग होकर कारोबार करने का फैसला किया, जिसके बाद से कारोबार में कई विवाद हुए। बेटे सत्यनारायण ने अलग होने के बाद हल्दीराम एंड संस नाम से अलग दुकान की शुरुआत की। जिसके बाद हल्दीराम के पोतों ने नागपुर में बिजनेस का दायरा बढ़ाया।  

नागपुर और साउथ में भी हल्दीराम का कारोबार फैलता गया। ग्राहकों तक पहुंचने के लिए कंपनी ने अपने कारोबार को तीन हिस्सों में बांट दिया गया। इस बंटवारे का मकसद अधिक से अधिक ग्राहकों तक आसानी से पहुंचना था। दक्षिण और पूर्वी भारत के कारोबार को कोलकाता से हैंडल किया गया, जिसका नाम ‘हल्दीराम भुजियावाला’ रखा गया। पश्चिमी भारत के कारोबार का कंट्रोल नागपुर के ‘हल्दीराम फूड्स इंटरनेशनल’ से होता है और उत्तरी भारत के कारोबार का कंट्रोल दिल्ली के ‘हल्दीराम स्नैक्स एंड एथनिक फूड्स’ से होता है। 

आज देश के साथ-साथ करीब 80 देशों में हल्दीराम के प्रोडक्ट्स का निर्यात किया जाता है। हालांकि अमेरिका में इसके प्रोडक्ट को लेकर विवाद भी हुआ। साल 2015 में कंपनी को उस वक्त बड़ा झटका लगा, जब अमेरिका ने हल्दीराम के निर्यात पर रोक लगा दी। कहा गया कि हल्दीराम अपने प्रोडक्ट्स में कीटनाशक का इस्तेमाल करता है। 

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