अब एक बार फिर क्यों चर्चा में है एलआईसी, जानिए इसका विशेष कारण 

मुंबई- देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी एलआईसी एक बार फिर चर्चा में है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने बुधवार को खम्मम में आयोजित विपक्षी नेताओं की एक रैली में एलआईसी का मुद्दा उठाया। उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार पर एलआईसी को निजी हाथों में बेचने का आरोप लगाया। साथ ही कहा कि अगर केंद्र में उनकी सरकार बनी तो इस कंपनी का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाएगा।  

केंद्र सरकार पिछले साल एलआईसी का आईपीओ लेकर आई थी जो देश का अब तक का सबसे बड़ा आईपीओ था। इसका इश्यू प्राइस 949 रुपये था और आज इसकी कीमत 703 रुपये रह गई है। कभी सरकार के लिए दुधारू गाय रही एलआईसी आज बिकने के कगार पर पहुंच गई। 

सरकार पिछले साल एलआईसी का आईपीओ लाई थी। इसका साइज 21,000 करोड़ रुपये का था। इस आईपीओ के जरिए सरकार ने कंपनी में अपनी 3.5 फीसदी हिस्सेदारी बेची थी। पहले सरकार की एलआईसी में पांच फीसदी हिस्सेदारी बेचने की योजना थी लेकिन बाजार में जारी उतार-चढ़ाव को देखते हुए उसने 3.5 फीसदी हिस्सेदारी ही बेची थी। इस आईपीओ को कुल 2.95 गुना बोलियां मिली थीं। कई लोगों ने एलआईसी का शेयर लेने के लिए पहली बार डीमैट अकाउंट खोला था। लेकिन यह शेयर निवेशकों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। 

60 साल से अधिक पुरानी इस सरकारी इंश्योरेंस कंपनी का सफर शानदार रहा है। यह देश की सबसे बड़ी इंश्योरेंस कंपनी है। भारत के इंश्योरेंस मार्केट में इसकी 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी है। यह सरकार की तारणहार रही है। जब भी सरकार मुश्किल में फंसती है तो एलआईसी ही उसे उबारती रही है। इस कारण एलआईसी को भी काफी नुकसान उठाना पड़ा है। साल 2015 में ओएनजीसी के आईपीओ को एलआईसी ने ही पार लगाया था। कर्ज से जूझ रहे आईडीबीआई बैंक की नैया भी एलआईसी ने पार लगाई थी। लेकिन अब एलआईसी खुद बिकने के कगार पर है।  

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एलआईसी में हिस्सेदारी की बिक्री का प्रस्ताव रखते हुए कहा था कि शेयर बाजार में किसी कंपनी के लिस्ट होने से कंपनी में अनुशासन आता है और इससे वित्तीय बाजारों तक उसकी पहुंच बनती है। कंपनी के लिए संभावनाओं के द्वार खुलते हैं और खुदरा निवेशकों को भी कमाई का मौका मिलता है।  

एलआईसी देश की सबसे बड़ी संस्थागत निवेशक है और कई कंपनियों में उसकी हिस्सेदारी है। हाल के वर्षों में एलआईसी का एनपीए बढ़ा है। इसकी वजह यह है कि उसने जिन कंपनियों में निवेश किया था, उनमें से कई की हालत खराब है। इसमें से कई तो दिवालिया प्रॉसीडिंग से गुजर रही हैं। इनमें दीवान हाउसिंग, अनिल अंबानी की रिलायंस कैपिटल, इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस, पीरामल कैपिटल और यस बैंक शामिल हैं।  

सरकार ने जब 2009 में सरकारी कंपनियों को बेचना शुरू किया तो एलआईसी ख़रीदने में सबसे आगे थी। 2009 से 2012 तक सरकार ने विनिवेश से नौ अरब डॉलर कमाए जिसमें एलआईसी का एक तिहाई हिस्सा था। एलआईसी के कर्मचारियों के एक गुट ने आईपीओ लाने के केंद्र सरकार के फैसले का विरोध किया था। उनका तर्क है कि इससे कंपनी की इमेज प्रभावित होगी। एलआईसी की तरक्की में पॉलिसीहोल्डर्स और एजेंटों के भरोसे का सबसे बड़ा हाथ है। अगर सरकार इसमें हिस्सेदारी बेचती हैं तो इससे पॉलिसीहोल्डर्स का भरोसा डगमगा जाएगा।  

एलआईसी के कामकाज के लिए संसद ने अलग से कानून बनाया था। इसकी धारा 37 में एलआईसी बीमा की राशि और बोनस को लेकर केंद्र सरकार की गारंटी होती थी। प्राइवेट सेक्टर की बीमा कंपनियों के साथ यह बात नहीं था। शायद यही वजह है एलआईसी में देश का भरोसा बना हुआ था। 

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