आयकर की धारा 80सी में आठ साल बाद फिर से है छूट की उम्मीद 

मुंबई- अधिकांश व्यक्तिगत करदाता टैक्स बचाने के लिए आयकर की धारा 80सी को अपनाते हैं। हालांकि, ज्यादातर को अब यह सीमा काफी कम लगती है। वे कई साल से बजट में इस सीमा की बढ़ोतरी का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। इस बार बजट में एक बार फिर से छूट बढ़ने की उम्मीद है।  

सीए अजय कुमार सिंह कहते हैं कि यह नहीं भूलना चाहिए कि समय के साथ-साथ महंगाई आदि के कारण पैसे या निवेश का मूल्य कम हो गया है। करदाताओं को बचत और निवेश के लिए प्रोत्साहन प्रदान करने के लिए मौजूदा सीमा को बढ़ाकर 2.5 लाख रुपये करने पर विचार किया जा सकता है।  

2020 के बजट में पेश की गई नई टैक्स व्यवस्था के बजाय ज्यादातर लोग पुरानी टैक्स व्यवस्था को पसंद कर रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें ज्यादा टैक्स बचाने के लिए विभिन्न कटौतियों का उपयोग करना उन्हें रास आ रहा है। धारा 80सी को 2005 के बजट में बदला गया था। तब शुरुआती सीमा एक लाख रुपये थी। 2014-15 में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसे बढ़ाकर 1.5 लाख रुपये प्रति वित्त वर्ष कर दिया था। उसके बाद से इसमें कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। 2014-15 में की गई वृद्धि से आठ साल बाद इस बार फिर इस सीमा के बढ़ने की उम्मीद है। 

मध्य वर्ग के करदाताओं को कमरतोड़ महंगाई से राहत दिए जाने की जरूरत है। ऐसे और भी कारण हैं जो धारा 80सी के तहत अधिक राहत की मांग करते हैं। रहन-सहन के खर्चों में लगातार वृद्धि ने मध्य वर्ग के लोगों को सबसे ज्यादा मुश्किल में डाला है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने रेपो दर में रिकॉर्ड बढ़ोतरी कर इसे नीचे लाने की कोशिश की, बावजूद खुदरा महंगाई 2022 के पहले 10 महीनों में 6 फीसदी से ऊपर रही। बढ़ती ब्याज दरों के कारण कर्ज की किस्त में भी अच्छी खासी वृद्धि हुई है। इसने घरेलू बजट को और बिगाड़ दिया है और कमाई को कम कर दिया है। 

चूंकि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में महंगाई इतनी बड़ी चिंता का विषय नहीं रही है। इसलिए अब यह स्थिति सरकार को मध्य वर्ग के करदाताओं में सबसे लोकप्रिय टैक्स बचाने वाली 80सी की सीमा बढ़ाने के लिए मजबूर कर सकती है। 2014-15 में लागत मुद्रास्फीति सूचकांक (सीआईआई) 240 था। यह अब 331 है और वर्तमान महंगाई दर को अगर 6 फीसदी भी माना जाए तो यह अगले वित्त वर्ष के लिए लगभग 351 आता है। इसी के लिए अब इस वृद्धि पर चर्चा की जा रही है।  

इसके हिसाब से देखें तो मौजूदा सीमा लगभग 2.19 लाख रुपये होनी चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि पीपीएफ और अन्य कर बचत योजनाओं में निवेश को कटौती के रूप में अनुमति दी जानी चाहिए। बजट में रियायती आयकर व्यवस्था के तहत 30 प्रतिशत कर की सीमा को 20 लाख रुपये तक बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि इसे मध्यम आय वाले करदाताओं के लिए आकर्षक बनाया जा सके। 

टैक्स विशेषज्ञ बताते हैं कि परिस्थितियां ऐसी हैं कि वे इसकी सीमा में वृद्धि की गारंटी देती हैं। टैक्स डिडक्शन लोगों को निवेश करने के लिए प्रेरित कर सकती है। जब मोदी सरकार 2019 में दोबारा सत्ता में आई तो ज्यादातर व्यक्तिगत करदाताओं को इस सरकार से बड़ी राहत की उम्मीद थी। लेकिन ऐसा अब तक नहीं हुआ है। आने वाला बजट 2024 में आम चुनाव से पहले आखिरी पूर्ण बजट होगा।  

इस बात की संभावना है कि सरकार कोरोना और रूस-यूक्रेन के साये में बने बजट से लोगों को कुछ राहत दे सकती है। अगले साल सरकार लेखानुदान के लिए जा सकती है। ऐसे में सरकार आम चुनाव से पहले मध्य वर्ग के करदाताओं को कुछ बहुप्रतीक्षित राहत दे। खर्च और निवेश सहित 10 से अधिक चीजें हैं, जिसके लिए एक करदाता धारा 80 सी के तहत कटौती का दावा कर सकता है। अधिकांश लोग, विशेष रूप से वेतनभोगी व्यक्ति प्रॉविडेंट फंड (पीएफ) में अनिवार्य योगदान के साथ 1.5 लाख रुपये की कटौती सीमा को समाप्त कर देते हैं।  

इस वजह से होम लोन के मूलधन, जीवन बीमा पॉलिसियों के प्रीमियम, छोटी बचत योजनाओं में निवेश, इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम (ईएलएसएस) आदि के पुनर्भुगतान के लिए कटौती का दावा करने की बहुत कम गुंजाइश बचती है। ऐसे में यदि कोई लंबे समय के लिए निवेश करना चाहता है और टैक्स को बचाना चाहता है तो यह सीमा कम पड़ जाती है। 

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