नोएडा और ग्रेटर नोएडा में रुक सकती है 1.5 लाख घरों की रजिस्ट्री

मुंबई- रियल एस्टेट के संगठन क्रेडाई-एनसीआर ने मंगलवार को नोएडा और ग्रेटर नोएडा के विकास प्राधिकरणों से उनकी बकाया भूमि पर सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण रखने की अपील की। अगर ऐसा नहीं होता है तो नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों द्वारा सुप्रीमकोर्ट के आदेश के अमल से इन दो शहरों में 1.5 लाख घरों की रजिस्ट्री में देरी हो सकती है। साथ ही रियल्टी डेवलपर्स दिवालियापन की ओर भी जा सकते हैं। इन्होंने कहा कि जो भी जमीन की बकाया राशि है, उस पर अगर नरम रूख अपनाया जाता है तो उन्हें दिवालिया होने से बचाया जा सकता है। साथ ही घर खरीदारों की भी इससे रक्षा हो पाएगी। 

एसोसिएशन ने एक बयान में कहा, नोएडा और ग्रेटर नोएडा के 100 से अधिक रियल एस्टेट डेवलपर्स ने इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए एक आंतरिक बैठक की। इसमें बिल्डरों को राहत देने के लिए अधिकारियों को एकमुश्त समाधान योजना के साथ आने पर चर्चा की गई।  

10 जून, 2020 के अपने आदेश को वापस लेने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नोएडा और ग्रेटर नोएडा के रियल एस्टेट डेवलपर्स बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। इसमें विभिन्न बिल्डरों को पट्टे पर दी गई जमीन के बकाया पर 8 फीसदी की ब्याज दर तय की थी। विकास प्राधिकरणों ने बिल्डरों को नोटिस भेजना शुरू कर दिया है। इसमें उन्हें भूमि आवंटन से संबंधित बकाया राशि का भुगतान करने के लिए कहा गया है। 

क्रेडाई-एनसीआर के अध्यक्ष मनोज गौड़ ने कहा, कोर्ट आदेश और अधिकारियों की प्रतिक्रिया का अध्ययन करने के बाद डेवलपर्स ने महसूस किया कि 15-23 फीसदी चक्रवृद्धि ब्याज से उनकी परेशानी बढ़ सकती है। उन्होंने कहा, यह दर मौजूदा बाजार दर से कहीं अधिक है। उस स्थिति में हमें एनसीएलटी (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) का सहारा लेना पड़ सकता है। क्रेडाई-एनसीआर ने कहा, एकमुश्त सेटलमेंट योजना से हरियाणा में समस्या सुलझ गई थी। 

एसोसिएशन ने कहा, चूंकि उत्तर प्रदेश भी हरियाणा की तरह एक भाजपा शासित राज्य है, इसलिए एक सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण की आवश्यकता है।डेवलपर्स ने अधिकारियों से कहा कि देरी उनके नियंत्रण से बाहर की घटनाओं के कारण भी थी। जमीनों के टाइटल सही नहीं थे। इसके अलावा ओखला पक्षी अभयारण्य पर एनजीटी के आदेश ने सभी निर्माण गतिविधियों पर रोक लगा दी। साथ ही भूखंडों तक पहुंच और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं का अधिकारियों ने वादा किया था, लेकिन निर्धारित समय के भीतर वह पूरा नहीं हुआ। जिससे डेवलपर्स को जमीन का कब्जा लेना टालना पड़ा। 

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