रेवडियां बांटने से राज्यों पर 60 लाख करोड़ का कर्ज, फिर भी गरीबी चरम पर 

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कहा कि मुफ्त उपहार (रेवड़ियां) और कल्याणकारी योजनाएं दो अलग-अलग चीजें हैं। कोर्ट ने कहा कि कल्याणकारी उपायों और अर्थव्यवस्था को होने वाली धनहानि के बीच संतुलन बनाया जाना चाहिए। मुफ्त उपहारों के बजाय उस धन को बुनियादी ढांचे के विकास पर खर्च किया जा सकता है।  

सुप्रीम कोर्ट ने इस संभावना को भी खारिज कर दिया कि वह मुफ्त उपहारों का वादा करने वाली पार्टियों की मान्यता खत्म करने वाली याचिका पर विचार करेगी। इस बारे में चीफ जस्टिस एनवी रमण और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने सभी पक्षकारों से 17 अगस्त तक सुझाव मांगा। 

याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से पेश वरिष्ठ वकील विकास सिंह के तर्कों का संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने कहा, यह गंभीर विषय है और जिन्हें यह (मुफ्त उपहार) मिल रहे हैं, वह इसे जारी रखना चाहते हैं। हम एक कल्याणकारी राज्य हैं।  

मुफ्त रेवड़ियों से संबंधित याचिका पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय के वकीलों ने रिजर्व बैंक का डाटा पेश कर बताया कि 31 मार्च, 2021 तक राज्यों पर 59,89,360 करोड़ रुपये कर्ज बकाया है। इसमें से यूपी और महाराष्ट्र पर जहां 6,62,891 और 5,36,891 करोड़ रुपये बाकी हैं वहीं राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) और बकाए के अनुपात के मामले में पंजाब की हालत सबसे खराब है।  

पंजाब पर कुल बकाया 2,49,187 करोड़ रुपये है लेकिन बकाए और जीएसडीपी का अनुपात 53 प्रतिशत यानी बकाया जीएसडीपी का 53 प्रतिशत है। रिजर्व बैंक का यह डाटा ‘हैंडबुक ऑफ स्टैटिस्टिक्स ऑफ इंडियन स्टेट्स फॉर 2020-2021’के नाम से प्रकाशित हुआ है।  

गौरतलब है कि पंजाब में आप सरकार ने 300 यूनिट तक बिजली मुफ्त देने और हर महिला को 1000 रुपये महीना देने का वादा कर रखा है। इन मदों में सरकारी खजाने पर 20 हजार करोड़ रुपये सालाना बोझ पड़ने की बात कही जा रही है। जाहिर है, पहले से कर्ज में डूबे राज्य की अर्थव्यवस्था पर यह बोझ भारी पड़ सकता है। 

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