रुपया पहुंचा 80 के करीब, मोबाइल फोन, कार खरीदना होगा महंगा 

मुंबई- अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की कीमत 80 रुपये के एकदम करीब पहुंच गई है। इससे महंगाई में और इजाफा होने की आशंका है। कच्चे तेल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों तक का आयात, विदेशी शिक्षा और विदेश यात्रा महंगी होने के साथ ही महंगाई की स्थिति और खराब होने की आशंका है।  

रुपये की कीमत में गिरावट का प्राथमिक और तात्कालिक प्रभाव आयातकों पर पड़ता है। जिन्हें समान मात्रा के लिए अधिक कीमत का भुगतान करना पड़ता है। हालांकि, यह निर्यातकों के लिए एक वरदान होता है, क्योंकि उन्हें डॉलर के बदले अधिक रुपये मिलते हैं। रुपया गुरुवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 79.99 रुपये के सर्वकालिक निचले स्तर पर बंद हुआ था। 

रुपये की इस तेज गिरावट ने भारत के लिए कुछ लाभों को लगभग खत्म कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय तेल और ईंधन की कीमतें रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले के स्तर तक गिर गई हैं। इससे जो लाभ भारत को मिलता, वह रुपये के मूल्य में आई गिरावट से नहीं मिल पाएगा। गौरतलब है कि भारत पेट्रोल, डीजल और जेट ईंधन जैसी जरूरतों को पूरा करने के लिए आयातित तेल पर 85 फीसदी तक निर्भर है। 

भारत में आयात होने वाली प्रमुख सामग्रियों में कच्चा तेल, कोयला, प्लास्टिक सामग्री, रसायन, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, वनस्पति तेल, उर्वरक, मशीनरी, सोना, मोती, कीमती और अर्ध-कीमती पत्थर तथा लोहा व इस्पात शामिल हैं। रुपये की कीमत में बड़ी गिरावट आने से इन वस्तुओं की कीमतों पर असर पड़ सकता है।  

आयातित वस्तुओं के भुगतान के लिए आयातकों को अमेरिकी डॉलर खरीदने की जरूरत पड़ती है। रुपये में गिरावट आने से सामानों का आयात करना महंगा हो जाएगा। सिर्फ तेल ही नहीं, बल्कि मोबाइल फोन, कुछ कारें और उपकरण भी महंगे होने की संभावना है। 

अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट का मतलब होगा कि विदेशी शिक्षा अभी और महंगी हो गई है। विदेशी संस्थानों को किये जाने वाले शुल्क के भुगतान में अधिक रुपयों की जरूरत पड़ेगी। साथ ही रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि के बाद एजुकेशन लोन भी महंगा हो गया है। 

कोविड-19 मामलों में गिरावट आने के बाद विदेश यात्राएं बढ़ रही हैं, लेकिन अब ये और महंगी हो गई हैं। अनिवासी भारतीय (NRI) जो पैसा अपने घर भेजते हैं, वे रुपये के मूल्य में और अधिक भेजेंगे। 

ताजा आंकड़ों के मुताबिक, जून महीने में पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले देश का आयात 57.55 फीसदी बढ़कर 66.31 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। जून 2022 में वस्तुओं का व्यापार घाटा 26.18 अरब डॉलर हो गया, जो जून 2021 के 9.60 अरब डॉलर से 172.72 फीसदी की वृद्धि को दर्शाता है। जून में कच्चे तेल का आयात लगभग दोगुना बढ़कर 21.3 अरब डॉलर हो गया। जून 2021 में 1.88 अरब डॉलर के मुकाबले कोयला और कोक का आयात जून 2022 में दोगुना से भी अधिक होकर 6.76 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। 

मौजूदा परिदृश्य में इसकी बड़े पैमाने पर उम्मीद की जा रही है कि रिजर्व बैंक प्रमुख ब्याज दरों में लगातार तीसरी बार वृद्धि कर सकता है। खुदरा मुद्रास्फीति सात फीसदी से ऊपर बनी हुई है, जो रिजर्व बैंक के छह फीसदी के सुविधाजनक स्तर से कहीं अधिक है। थोक बिक्री मूल्य आधारित सूचकांक (WPI) के भी 15 फीसदी से ऊपर बने रहने से स्थिति और भी बिगड़ गई है। 

निर्यातकों की शीर्ष संस्था फियो के महानिदेशक अजय सहाय ने कहा कि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 80 के स्तर को छूने से भारत के आयात खर्च बढ़ेगा और मुद्रास्फीति को संभालना और भी मुश्किल हो जाएगा। सहाय ने कहा, ‘‘आयातित मध्यवर्ती वस्तुओं की कीमतें बढ़ेंगी और इससे व्यवसायों की विनिर्माण लागत बढ़ेगी, जो उस लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डालेंगे, जिससे माल की कीमत बढ़ेगी।  

सहाय ने कहा, ‘‘जो लोग अपने बच्चों को शिक्षा के लिए विदेश भेजना चाहते हैं, उन्हें कठिनाई का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि मूल्यह्रास के कारण यह काम करना महंगा हो जाएगा।’’ वित्त मंत्रालय की गुरुवार को जारी एक रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि महंगा आयात और कम माल निर्यात के कारण चालू वित्त वर्ष में भारत के चालू खाते का घाटा बिगड़ने की आशंका है। 

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