खाने के तेलों की कीमतें हर लीटर के पीछे 50 रुपये तक घटीं, आगे और राहत 

मुंबई- देशी बाजारों में खाद्यतेलों के भाव टूटने से देशभर के तेल-तिलहन बाजारों में बीते सप्ताह सरसों, सोयाबीन, मूंगफली तेल-तिलहन तथा बिनौला, सीपीओ, पामोलीन तेल सहित विभिन्न तेल तिलहनों में गिरावट आई।  

आयात किये जाने वाले सोयाबीन डीगम, सीपीओ, पामोलीन और सूरजमुखी तेल के थोक दाम में लगभग 50 रुपये किलो तक की गिरावट आई है। इसके अलावा आयातकों ने जिस पुराने भाव पर खाद्य तेलों का आयात कर रखा है, विदेशों में तेल तिलहनों के भाव अचानक टूटने से इन आयातकों को खरीद भाव के मुकाबले 50-60 डॉलर नीचे भाव पर अपने माल को बेचना पड़ सकता है। उन्हें अब बैंक कर्ज का भुगतान डॉलर के अधिक हुए दाम के हिसाब से करना होगा। 

अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये के अपने ऐतिहासिक निम्न स्तर पर जा पहुंचने से आयातकों को कहीं अधिक धनराश जेब से निकालनी पड़ रही है। इससे जहां देश में आयातक की बुरी हालत है वहीं उनके लिए अब खरीद के मुकाबले काफी सस्ते दाम पर तेल बेचना होगा। लेकिन इन सबके बाद भी इस गिरावट का लाभ उपभोक्ताओं को नहीं मिल पा रहा है क्योंकि खुदरा कारोबार में अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) की आड़ में उपभोक्ताओं से मनमानी कीमत वसुली जा रही है और बाजार में एमआरपी की जांच करने वाले नदारद हैं। 

विदेशों में भाव टूटने और उसकी वजह से स्थानीय खाद्यतेलों पर दबाव होने के बावजूद सरसों पर कोई विशेष फर्क देखने को नहीं मिला। बाजार में सरसों की आवक घटकर लगभग दो-सवा दो लाख बोरी रह गई है जबकि यहां इसकी दैनिक मांग लगभग 4.5-5 लाख बोरी की है। सरसों का इस बार उत्पादन जरूर बढ़ा है पर आयातित तेलों के महंगा होने के समय जिस रफ्तार से सरसों के रिफाइंड बनाकर आयातित तेलों की कमी को पूरा किया गया, उससे आगे चलकर त्यौहारों के मौसम में सरसों या हल्के तेलों की दिक्कत बढ़ सकती है। सहकारी संस्थाओं के पास इस बार इसका स्टॉक भी नहीं बनाया गया है। 

परमिट हासिल करने के चक्कर में हल्के तेलों के नये खेप के लिए आर्डर नहीं दिये जा सके हैं और जो पुराने आर्डर हैं केवल उसी के लिए जहाजों पर लदान हो रहे हैं। परमिट मिलने के बाद आर्डर देने के बाद नये माल के आने में लगभग दो-ढाई महीने का समय लगता है। त्यौहारों के दौरान आर्डर की कमी होने की वजह से खाद्यतेल आपूर्ति की दिक्कत देखने को मिल सकती है। 

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