विज्ञापनों में लैंगिक चित्रण को बढ़ावा देने पर लगेगी रोक 

मुंबई- एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया (एएससीआई) ने लैंगिंक रूढ़िवाद पर दिशा निर्देश जारी किया है। इसने कहा है कि विज्ञापनों में लैंगिक चित्रण को बढ़ावा देने पर रोक लगाई जाए। क्योंकि यह समाज के लिए हानिकारक है। इसने विज्ञापनों में दिखाए जाने वाले चित्रों की एक सीमा भी तय कर दी है।  

मुख्य रूप से महिलाओं से संबंधित सभी मामलों में इसका पालन करना होगा। विज्ञापन देने वाली कंपनियों को यह निर्देश दिया गया है कि वे प्रगतिशील लैंगिक चित्रों को बढ़ावा देने वाली सामग्रियों को प्रोत्साहित करें। एएससीआई ने कहा कि भले ही यह निर्देश महिलाओं से संबंधित है, पर अन्य लिंग वालों के गलत चित्रण में भी यह लागू होगा। इसने कहा कि भाषा के उपयोग या विजुअल के मामले में यह वहां भी लागू होगा, जहां उत्पाद इससे संबंधित नहीं हैं।  

दिशानिर्देश में कहा गया है कि विज्ञापनों में लैंगिक आधार पर लोगों का मजाक नहीं बनाया जाना चाहिए। इस दिशा निर्देश को केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी ने बुधवार को जारी किया था। इसके अनुसार किसी भी लिंग के लिए अपमानजक भाषा या लहजे के जरिये दूसरों पर अधिकार जमाने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही विज्ञापन लिंग के आधार पर हिंसा (शारीरिक या भावनात्मक), गैरकानूनी या असामाजिक व्यवहार को बढ़ावा नहीं दे सकते।   

दिशा निर्देश के मुताबिक, उदाहरण के तौर पर अगर कोई ऑन लाइन सेवा लेता है और उसमें महिला को फास्ट फूड आइटम के पीछे आधे वस्त्र में उत्तेजक मुद्रा के रूप में दिखाया जाता है तो यह एक गलत या समस्या वाला विज्ञापन हो सकता है। इसने कहा है कि भले ही यौन रूप से छवि स्पष्ट न हो, पर ऐसे विज्ञापनों की कोई प्रासंगिकता नहीं होती है। विज्ञापन में महिलाओं को वस्तुओं के रूप में नहीं दिखाना चाहिए। 

दिशा निर्देश में कहा गया है कि विज्ञापनों को गलत और अवांछनीय लिंग आदर्शों या अपेक्षाओं के तहत बढ़ावा नहीं देना चाहिए। इसके अलावा किसी विज्ञापन में ऐसा संदेश नहीं देना चाहिए जिसमें यह साबित हो कि व्यक्ति लिंग के कारण किसी काम को करने में विफल है। उदाहरण स्वरूप इसमें पुरुष की लंगोट बदलने में असमर्थता और एक महिला को कार पार्क करने में दिक्कत होती है। 

दिशा निर्देश में कहा गया है कि विज्ञापनों को ग्लैमरस और आकर्षक दिखाने पर रोक नहीं है, पर इससे किसी व्यक्ति की खुशी या भावना को लैंगिंक तरीके से प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए। बच्चों के मामलों में भी कहा गया है कि उनके लैंगिंक चित्रण तो दिखा सकते हैं, पर लैंगिक आधार पर वे किसी खेल या करियर में फेल हो जाते हैं, ऐसा नहीं होना चाहिए। 

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