देश में वीआईपी लोगों की सुरत्रा पर 12 हजार करोड़ रुपये होता है खर्च 

मुंबई- देश में वीआईपी लोगों को ‘महफूज’ रखना महंगा पड़ रहा है। बीस हजार से अधिक विशिष्ट एवं अति विशिष्ट लोगों को एक तय संख्या में सुरक्षा कर्मी मिले हुए हैं। प्रधानमंत्री के एसपीजी सुरक्षा कवर से लेकर जेड प्लस, जेड, वाई प्लस, वाई और एक्स श्रेणी की सुरक्षा के अलावा केंद्र व राज्य में एक या दो सुरक्षाकर्मी साथ लेकर चलने वाले वीआईपी लोगों का आंकड़ा काफी बड़ा है।  

वीआईपी सुरक्षा में लगे अधिकारियों के मुताबिक, 12000 करोड़ रुपये के सालाना खर्च पर लगभग 20 हजार वीआईपी ‘महफूज’ रहते हैं। इनकी सुरक्षा में 60,000 से अधिक जवान तैनात हैं। 30,000 से ज्यादा गाड़ियां, वीआईपी सिक्योरिटी में इस्तेमाल हो रही हैं। इस खर्च में तो केवल सुरक्षाकर्मियों का वेतन और वाहनों का पेट्रोल डीजल ही शामिल है। मसलन, खाना पीना, रहना, ट्रेवलिंग अलाउंस, जोखिम भत्ता एवं दूसरा कई तरह का खर्च अलग रहता है। केंद्र एवं राज्य सरकारें इस खर्च को वहन करती हैं। 

पंजाब सरकार ने 424 वीआईपी लोगों को दी गई सुरक्षा वापस ले ली है। पंजाब सरकार को वीआईपी सुरक्षा पर काफी खर्च करना पड़ रहा था। इससे पहले भी भगवंत मान सरकार ने कई विधायकों और पूर्व विधायकों एवं दूसरे नेताओं की सुरक्षा में तैनात पुलिस कर्मचारियों को वापस बुला लिया था। जिन लोगों की सुरक्षा वापस ली गई हैं, उनमें विभिन्न दलों के नेताओं के अलावा अनेक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी भी शामिल हैं।  

डेरे एवं धार्मिक नेताओं को भी सुरक्षा घेरा प्रदान किया गया था। जिनमें से काफी लोगों की सुरक्षा वापस ले ली गई है। लगभग 40 वीआईपी ऐसे हैं, जिनके पास दो-दो सशस्त्र पुलिसकर्मी हैं। 124 वीआईपी के पास एक-एक हथियार बंद पुलिस कर्मी है। 17 वीआईपी के पास 3-3 पुलिस कर्मी हैं। आठ वीआईपी के पास 4-4 जवान हैं। 12 वीआईपी के पास अलग से कमांडो हैं।  

पंजाब में रिटायर्ड पुलिस अधिकारियों को भी काफी सुरक्षा मिली है जो बाकी राज्यों में नहीं मिलती है। यहां हर रिटायर्ड आईपीएस सुरक्षा के दायरे में रहता है। सुरक्षा मामलों से जुड़े अधिकारी के मुताबिक, सिक्योरिटी देने का मापदंड अलग अलग होता है। आईबी या लोकल एजेंसी की रिपोर्ट पर सुरक्षा मिलती है। हालांकि राज्यों में सुरक्षा देने का अपना ही एक मापदंड होता है। किसी को खतरा है या नहीं, सुरक्षा दे दी जाती है।  

अधिकांश राज्यों में रसूख के बल पर सुरक्षा मिल रही है। जेड प्लस सुरक्षा कवर में 46 सुरक्षाकर्मी रहते हैं। जेड के तहत 33, वाई प्लस में 11, वाई में 8 और एक्स श्रेणी में दो से छह तक जवान रहते हैं। हालांकि टीए डीए व दूसरे भत्ते कम ही मिलते हैं। पांच छह हजार से अधिक नहीं रहते। जेड और जेड प्लस सुरक्षा में एस्कोर्ट भी चलती है।  

देश में लगभग 240 लोगों को केंद्र की ओर से सुरक्षा दी गई है। यह आंकड़ा बदलता रहता है। अगर यहां 230 वीआईवी मानें तो उनकी सुरक्षा में लगभग 25 सौ से ज्यादा जवान तैनात रहते हैं। कई जगह पर एसआई, इंस्पेक्टर व एसी भी रहते हैं। एक सिपाही का मूल वेतन 35 से 40 हजार रहता है। इसमें अफसरों को भी, जिनकी संख्या कम रहती है, मिलाकर सिपाही का वेतन औसतन 45 हजार रुपये प्रति माह तय करते हैं तो एक माह में यह वेतन 11 करोड़ से ज्यादा हो जाता है।  

सुरक्षा अधिकारी के मुताबिक, बीस हजार वीआईपी की सुरक्षा के लिए 66 हजार जवान तैनात होते हैं तो एक जवान का औसत वेतन 45 हजार है। ऐसे में यह राशि 300 करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है। प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर पहले रोजाना एक करोड़ 62 लाख रुपये खर्च होते थे।  

साल 2014-15 में एसपीजी का बजट 289 करोड़ रुपये था। 2015-16 में 330 करोड़ और 2019-20 में यह बजट 540.16 करोड़ रुपये कर दिया गया। साल 2021-22 में एसपीजी का बजट 429.05 करोड़ रुपये था। मौजूदा समय में केवल पीएम मोदी को ही एसपीजी सुरक्षा मिलती है, इसलिए रोजाना का खर्च कम होकर 1.17 करोड़ रह गया है। 

देश में सिक्योरिटी प्राप्त सभी लोगों की बात करें तो उनके लिए 30 हजार से ज्यादा गाड़ियां भी इस्तेमाल होती हैं। एक माह में बीस दिन गाड़ी चलती है। दो गाड़ी का एक दिन का खर्च यदि पांच हजार रुपये है तो यह खर्च 300 करोड़ रुपये से अधिक रहता है। वीआईपी गाड़ी रोजाना कम से कम पचास किलोमीटर तो चलती ही है। प्रधानमंत्री एवं दूसरे वीआईपी लोगों के सुरक्षा खर्च को देखें तो वह सालाना 12 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा बैठता है।  

2019 की रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में 3,142 लोगों सुरक्षा दी गई थी। इसके बाद दूसरा नंबर पंजाब 2,594 का आता है। बिहार में 2,347 व हरियाणा में 1,355 और झारखंड में 1,351 लोगों को सुरक्षा मिली हुई थी। चुनाव के समय इस संख्या में बढ़ोतरी हो जाती है।  

दिल्ली में करीब 9 हजार जवान वीआईपी सुरक्षा में तैनात हैं। पांच सौ से अधिक लोगों को सुरक्षा मिली है। खास बात ये है कि इसके लिए दिल्ली पुलिस को बाहर से वाहनों का इंतजाम करना पड़ता है। किराये की गाड़ियों पर सालाना 53 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च हो रही है। दिल्ली में अनेक वीआईपी के साथ पायलट एस्कोर्ट चलती है। जिन्हें जेड व जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा मिली है, उनके लिए रोजाना के तामझाम पर करीब 11 लाख रुपये खर्च हो रहे हैं।  

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