भारत में आईपीओ को लेकर आखिर क्या परेशानियां हैं  

मुंबई- आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से कोई कंपनी पहली बार आम जनता को अपने शेयरों की पेशकश करती है। जनता को इक्विटी की पेशकश करके सार्वजनिक कंपनियों का पूंजी जुटाने का यह एक सामान्य तरीका है। पिछले वर्ष (2021) में, नए जमाने की टेक कंपनियों की सफलता और मजबूत खुदरा भागीदारी से प्रेरित होकर, घरेलू कंपनियों द्वारा आईपीओ के माध्यम से जुटाई गई कुल धनराशि 1.19 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड उच्च स्तर को छूने में सफल रही। 

आईपीओ को अक्सर व्यापारियों और निवेशकों द्वारा निवेश पर अच्छा रिटर्न हासिल करने का एक तरीका माना जाता है। रिकॉर्ड के अनुसार, 2021 के दौरान लिस्टिंग वाले दिन मिला औसत रिटर्न 31% रहा। हालांकि, रिटर्न का औसत आईपीओ और लिस्टिंग के दिन और उसके बाद के प्रदर्शन के बारे में निवेशकों की चिंताओं को कम नहीं करता है। मिसाल के तौर पर नए जमाने की टेक कंपनियां पेटीएम और ज़ोमैटो के शेयरों में लिस्टिंग के बाद काफी गिरावट आई है। 

एंजेल वन लिमिटेड के इक्विटी रिसर्च एनालिस्ट यश गुप्ता इस लेख में मुख्य रूप से भारत में आईपीओ के संबंध में सबसे बड़ी चिंताओं के बारे में विस्तृत से बता रहें हैं।  

ओएफएस (ऑफर फॉर सेल) के लिए एक महत्वपूर्ण हिस्से का आवंटन: पिछले वर्ष आईपीओ के माध्यम से जुटाई गई कुल राशि में से एक महत्वपूर्ण हिस्सा (लगभग 63%) ऑफर फॉर सेल के लिए था। ओएफएस एक ऐसी विधि को संदर्भित करता है जिसमें सार्वजनिक कंपनियों के प्रवर्तक या प्रोमोटर्स शेयर बेच सकते हैं। इसलिए नए इश्यू से आने वाली पूंजी के कंपनी में प्रवाहित होने की बजाए, ओएफएस वाले आईपीओ से मिली पूंजी कंपनी के मौजूदा शेयरधारकों के पास चली जाती है। एक निवेशक के लिए निवेश का निर्णय लेने से पहले यह आकलन करना महत्वपूर्ण है कि सार्वजनिक पेशकश के माध्यम से जुटाई गई पूंजी को कंपनी द्वारा कैसे इस्तेमाल किया जाएगा। 

आर्थिक गतिविधियों पर कोई खास असर नहीं: आईपीओ आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए हैं जैसे कि कंपनी की उत्पादन क्षमता बढ़ाना और रोजगार के अवसर पैदा करना। लेकिन इस तरह के ऑफर (ओएफएस आधारित) अक्सर प्रमोटरों या प्रवर्तकों और मौजूदा शेयरधारकों के मूल्य में वृद्धि करते हैं। उदाहरण के लिए, 2021 में, 63 में से केवल 4 इश्यू में ओएफएस शामिल नहीं था। इसलिए, आर्थिक विकास के दृष्टिकोण से धन का इस्तेमाल और उसकी तैनाती को लेकर कोई दृश्यता नहीं है। 

पीई और वीसी के लिए निकास मार्ग: प्रमोटरों की सेवा के अलावा, आईपीओ निजी निवेशकों (पीई) और वेंचर कैपिटलिस्ट्स (वीसी) के लिए एक निकास मार्ग के रूप में भी काम करता है। पिछले 6-7 वर्षों से भारतीय कंपनियों के साथ यह चलन रहा है और सार्वजनिक होने वाले स्टार्ट-अप उद्यमों में यह काफी आम है। इसका मतलब यह है कि इन ऑफर्स के माध्यम से जुटाई गई धनराशि इन निवेशकों के लिए एक निकास मार्ग प्रदान करती है। कुल आईपीओ के 50% ने निवेशकों के इस श्रेणी के निवेशकों को बाहर निकलने का मार्ग प्रदान किया। सकारात्मक पक्ष की बात की जाए तो पीई और वीसी को बाहर निकलने की पूंजी बाजार की क्षमता स्टार्ट-अप क्रांति को और आगे बढ़ा सकती है जो उद्यमियों की अगली पीढ़ी के लिए फायदेमंद हो सकती है। 

सेबी द्वारा उठाए गए कदम: इन मुद्दों को हल करने के लिए नियामक सेबी ने कुछ कदम उठाए हैं, जिसमें क्यूआईबी और एंकर निवेशकों के लिए लॉक-इन अवधि को 90 दिनों तक बढ़ाना, आईपीओ में सामान्य कॉरपोरेट उद्देश्यों के 35% की सीमा शुरू करना और अधिकांश हितधारकों को आईपीओ में प्री-ऑफर शेयरहोल्डिंग का केवल 50% तक ही बेचने के लिए प्रतिबंधित करना शामिल है। इसके अलावा, नियामक ने कई कारकों पर सुधार करने के लिए लगातार काम किया है जैसे अज्ञात अधिग्रहण के लिए धन का उपयोग करने पर 25% की सीमा तय की गई है। सभी प्रतिबंधों के अलावा, नियामक ने जागरूकता पैदा करने और निवेशकों को शिक्षित करने के लिए भी मिलकर काम किया है। 

सारांश: कंपनियों के लिए सबसे प्रमुख फंडिंग स्रोत के रूप में और खुदरा निवेशकों के लिए पर्याप्त लाभ कमाने के तरीके के रूप में आईपीओ की लोकप्रियता सूचीबद्ध चिंताओं के बावजूद लगातार बढ़ना जारी है। किसी भी निवेशक को आईपीओ के उद्देश्य और इस तरह के प्रस्ताव के लिए बहुसंख्यक शेयरधारकों के दृष्टिकोण के बारे में पता होना चाहिए।  

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