एक सरकारी कंपनी दूसरे पीएसयू में हिस्सेदारी नहीं खरीद सकती- वित्तमंत्रालय 

मुंबई। वित्तमंत्रालय ने कहा है कि एक सरकारी कंपनी किसी और सरकारीकंपनी में हिस्सेदारी नहीं खरीद सकती है। अगर ऐसा होता है तो इससे विनिवेशका मकसद पूरा नहीं हो पाएगा। मंत्रालय ने कहा कि यदि इस दौरान प्रबंधन केनियंत्रण किसी दूसरे सरकारी संगठन या राज्य सरकार को होता है तो इससेसरकारी क्षेत्र की कंपनी की अंतर्निहित क्षमताएं बनी रह सकती हैं और ऐसे में नई पीएसई नीति का सही उद्देश्य विफल हो जाएगा।  

निवेश और लोक संपत्ति प्रबंघन विभाग (दीपम) ने कहा कि एक चाहे कंपनियां राज्य की हों या केंद्रकी, किसी में भी दूसरी सरकारी कंपनी बोली नहीं लगा सकेगी। हालांकि, सार्वजनिक हित में केंद्र सरकार की विशेष मंजूरी के बाद इसमें छूट दी जा सकती है। ऐसी कंपनियां, जिनमें सरकार की 51 फीसदी या उससे ज्यादा हिस्सेदारी है, उन्हें सरकारी कंपनियों की सूची में रखा जाता है। 

दरअसल, पहले ऐसा होता था कि सरकारी कंपनियां अपनी अधिकांश हिस्सेदारी उसी क्षेत्र में काम करनेवालीदूसरी सरकारी कंपनियों को बेच देती थीं। 2001-02 में इंडो बर्मा पेट्रोलियम कंपनी में 74 फीसदी हिस्सा 1,153 करोड़ रुपये में इंडियन ऑयल को बेचा गया। जनवरी, 2018 में ओएनजीसी ने एचपीसीएल में सरकार की पूरी 51.11 फीसदी हिस्सेदारी 36,915 करोड़ रुपये में खरीद ली थी। इसी तरह से मार्च, 2019 में पावर फाइनेंस कॉर्प ने आरईसी में सरकार की 52.63 फीसदी हिस्सेदारी 14,500 करोड़ रुपये में खरीदीथी।  

2001 से 2019-20 के दौरान सरकार ने 9 सीपीएसई में अपनी पूरी हिस्सेदारीअन्य सरकारी कंपनियों को बेच दी थी। इससे उसे कुल 53,450 करोड़ रुपये मिले थे। सरकार ने फरवरी, 2021 में जो नीति जारी की थी, उसके मुताबिक चार रणनीतिक क्षेत्रों में सीपीएसई की कम से कम संख्या को बरकरार रखा जाएगा। जबकि बाकी का निजीकरण या विलय कर दिया जाएगा। इन चार क्षेत्रों में परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष और रक्षा, परिवहन और दूरसंचार, बिजली, पेट्रोलियम, कोयला और खनिज और बैंकिंग बीमा और वित्तीय सेवाएं शामिल थे।

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