बैंकिंग में कासा क्या होता है, इसे जान सकते हैं

मुंबई- करेंट एकाउंट (सीए) यानी चालू खाते और सेविंग एकाउंट (एसए) यानी बचत खाते को मिला दें तो बनता है सीएएसए यानी कासा। बैंक की कुल जमाराशि में कासा जमा का हिस्सा कितना है, इससे उसकी लागत पर बहुत फर्क पड़ता है।

चालू खाते मुख्तया कंपनियां, फर्में व व्यापारी व उद्यमी रखते हैं जो हर दिन खाते से काफी लेन-देन करते हैं। जबकि बचत खाते में हमारे-आप जैसे आम लोग अपना धन जमा रखते हैं और इसका इस्तेमाल अमूमन गैर-व्यावसायिक कामों के लिए करते हैं। बैंक जहां चालू खाते में जमा रकम पर कोई ब्याज नहीं देते, वहीं बचत खाते की रकम पर वे 3.5 फीसदी सालाना की दर से ब्याज देते हैं। इस तरह सावधि जमा या फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) जैसे अन्य माध्यमों की तुलना में बैंकों के लिए कासा डिपॉजिट धन हासिल करने का सबसे सस्ता साधन है। नतीजतन, जिस बैंक की कुल जमाराशि में कासा जमा का हिस्सा जितना अधिक होता है, उस बैंक की जमा या फंड लागत उतनी ही कम होती है।

अपने यहां बैंकों की कुल जमाराशि में कासा जमा का हिस्सा एक तिहाई से ज्यादा है। दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में देश में कार्यरत विदेशी बैंक सबसे बेहतर स्थिति में हैं। उसके बाद क्रम से स्टेट बैंक व उसके सहयोगी बैंक, राष्ट्रीयकृत बैंक और निजी क्षेत्र के बैंक आते हैं।

कुल जमा में कासा का घटता हिस्सा और इसकी वृद्धि दर में आ रही गिरावट बैंकिंग क्षेत्र के लिए चुनौती पेश कर सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि बैंकिंग क्षेत्र के लिए कासा जमा उनके लिए धन का सबसे सस्ता स्रोत है। अगर यह स्रोत सूखता है तो बैंकों के लिए धन के वैकल्पिक स्रोत हासिल करना न केवल मुश्किल होगा, बल्कि यह महंगा भी पड़ेगा। इसलिए बैंक अपनी कासा जमा को बढ़ाने पर खास ध्यान देते हैं। फाइनेंशियल इनक्लूजन या वित्तीय समावेश के तहत अधिक से अधिक खाते खोलना उनकी इसी कोशिश का एक हिस्सा है।

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