कोरोना कॉल में न्यूड कॉल्स से ब्लैकमेलिंग में फंसा रहे हैं ठग, छोटे इलाकों से चल रहा है यह धंधा

मुंबई-उत्तर प्रदेश में रामपुर के एक भाजपा नेता के पास इस साल 22 अप्रैल को इसी तरह की अश्लील कॉल आती है और फिर उनसे भी पैसे की मांग शुरू हो जाती है। पैसे न देने पर वीडियो वायरल करने की धमकी दी जाती है। वे 24 मई को हिम्मत करके पुलिस से इसकी शिकायत करते हैं तो पूरा मामला सामने आता है। 

सोशल मीडिया पर अश्लील कॉल कर किसी व्यक्ति का आपत्तिजनक स्थिति में वीडियो बना लिया जाता है और फिर उसे ब्लैकमेल कर पैसे वसूले जाते हैं। पुलिस इस तरह के साइबर अपराध को सेक्सटॉर्शन का नाम देती है। सेक्सटॉर्शन यानी सेक्स संबंधी किसी वीडियो या चैट के जरिए पैसे वसूल करना। 

पुलिस अधिकारी इस बारे में बताते हैं कि सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति से नजदीकी बढ़ाई जाती है और फिर उसे वीडियो कॉल पर आने का लालच दिया जाता है। वीडियो कॉल पर उस आदमी के सामने आने पर रिकॉर्डेड पोर्न वीडियो इस तरह चलाया जाता है कि वह लाइव जैसा लगता है। पोर्न वीडियो चलने के दौरान कॉल पर सामने आए व्यक्ति को कपड़े उतारने को कहा जाता है और फिर उसकी स्क्रीन रिकॉर्ड कर ली जाती है। बाद में यही रिकॉर्ड स्क्रीन उस व्यक्ति को भेजकर ब्लैकमेल किया जाता है। 

यूपी भाजपा नेता की ब्लैकमेलिंग के मामले की जांच कर रहे रामपुर के पुलिस इंस्पेक्टर ब्रजेश सिंह बताते हैं कि ‘जब हमने अपराधियों को पकड़ा तो उनसे हमें कई ऐसे लोगों की जानकारी मिली, जिन्होंने अपराधियों को पैसे चुका दिए थे, लेकिन उन पीड़ितों के वीडियो इनके फोन में अभी भी थे। अगर ये न पकड़े जाते तो फिर यह लोग कभी भी उनको ब्लैकमेल करना शुरू कर देते। भाजपा नेता ने समय पर पुलिस को सूचना दे दी, ऐसे में उनकी कॉल ट्रेस कर आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन ऐसे 90% मामलों में पीड़ित पुलिस के सामने नहीं आते हैं।’ 

उत्तर प्रदेश भाजपा नेता के मामले में अपराधियों ने सिम कार्ड ओडिशा के मजदूरों के नाम पर लिए थे। जबकि कॉल भरतपुर से किए जा रहे थे। इस गिरोह के कुछ लोग दिल्ली से भी फोन करते थे। जांच अधिकारी ब्रजेश सिंह बताते हैं कि जब हमने जांच की शुरुआत की तो तार राजस्थान के भरतपुर, ओडिशा, दिल्ली और हरियाणा के मेवात से जुड़े। पीड़ित को कॉल कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए किए जा रहे थे। हर बार अलग-अलग लोकेशन आ रही थी। कभी भरतपुर तो कभी रामपुर की। कुछ फोन दिल्ली से भी आ रहे थे। मुश्किल ये थी कि जांच कहां से शुरू करें। 

बैंक खाते भी फर्जी दस्तावेजों से खोले गए थे। पुलिस 15 दिन की कोशिशों के बाद सिर्फ एक नंबर ही ट्रेस कर सकी। इसके बाद पीड़ित से कहा गया कि वह ब्लैकमेलर्स को नकद पैसा देने का लालच दे। उनमें से एक युवक पैसे लेने के लिए दिल्ली पहुंचा, तब पुलिस उसे गिरफ्तार कर पाई। 

मामले के खुलासे में पता चला कि रामपुर का एक युवक सेंट बेचने राजस्थान गया था। यहां अपराधी उसके संपर्क में आए और उसे सेक्सटॉर्शन और साइबर अपराध करने की ट्रेनिंग दी गई। वहां से लौटकर उसने रामपुर से ये ठगी शुरू की। इस गिरोह ने बरेली, उत्तराखंड, हापुड़ और कई दूसरे जिलों में लोगों को शिकार बनाया। पुलिस ने कुछ पीड़ितों से संपर्क भी किया, लेकिन उन्होंने सामने आने से इंकार कर दिया। 

क्या लॉकडाउन के दौरान इस तरह के मामले बढ़े हैं? इस सवाल पर उत्तर प्रदेश पुलिस मुख्यालय में तैनात एसपी साइबर क्राइम त्रिवेणी सिंह कहते हैं कि लॉकडाउन में मामले निश्चित तौर पर बढ़े हैं। कितने बढ़े हैं, अभी इसकी एनालिसिस नहीं हुई है। लेकिन यह समझ लीजिए कि साइबर क्राइम ब्रांच के सभी रिसोर्सेज अभी ऐसे अपराधों की जांच में लगे हैं। यूपी पुलिस का कहना है कि ऐसे ज्यादातर अपराधों के सेंटर मथुरा, भरतपुर और मेवात में हैं।  

यूपी और दिल्ली पुलिस दोनों के अधिकारी मानते हैं कि भरतपुर और मेवात इस अपराध के गढ़ नजर आ रहे हैं। यूपी पुलिस की साइबर शाखा के एक अधिकारी बताते हैं कि ‘यह धंधा कुटीर उद्योग की तरह चलाया जा रहा है। हजारों युवक इससे जुड़े हैं। गिरोह युवाओं को अपराध करने की ट्रेनिंग भी दे रहे हैं। इनमें से अधिकतर कम पढ़े-लिखे लोग हैं जो गांवों से ऑपरेट करते हैं।’ 

सेक्सटॉर्शन अब एक कॉटेज इंडस्ट्री बन गया है। पहले विदेशों से इस तरह के अपराध होते थे। अब यह कस्बों की ओर शिफ्ट हो गए हैं। कोरोना काल में लोगों की नौकरियां जा रही हैं। ऐसे में बहुत से लोग साइबर अपराध और सेक्सटॉर्शन की तरफ बढ़ रहे हैं क्योंकि इससे उन्हें ईजी मनी मिलती है।’ 

पुलिस अधिकारी मानते हैं कि ये धंधा कई परतों में चलता है। फर्जी दस्तावेजों से खाते खोलने वाले लोग अलग होते हैं, कॉल करने वाले अलग और फिर वसूली करने वाले अलग। यूपी की साइबर शाखा के एसपी त्रिवेणी सिंह कहते हैं कि ‘पैसा ऐसे अकाउंट में लिया जाता है जो कई बार रिक्शेवाले या मजदूरों के नाम पर खोला जाता है। पुलिस टीम जब उन तक पहुंचती है तो पता चलता है कि उन्होंने हजार पांच सौ रुपए के लालच में अपने अकाउंट की जानकारी अपराधियों को दे दी थी।  

अपराधी ट्रांजैक्शन होते ही एक अकाउंट से दूसरे अकाउंट में पैसा ट्रांसफर कर देते हैं। फिर वॉलेट में पैसा पहुंचा देते हैं। ये एक तरह से ट्रांजैक्शन की मल्टीलेयरिंग कर देते हैं ताकि आखिर में पैसा कहां गया ये पता ही ना चल पाए। अकाउंट खोलने में झारखंड, छत्तीसगढ़ या ओडिशा के रिमोट एरिया के लोगों का इस्तेमाल किया जाता है, जहां पुलिस आसानी से न पहुंच सके। 

इस तरह के रैकेट में फर्जी आधार कार्ड बनाए जाते हैं, इसके आधार पर फर्जी तरीके से सिमकार्ड लिए जाते हैं, फिर फर्जी बैंक अकाउंट खोले जाते हैं और सोशल मीडिया प्रोफाइल बना लिए जाते हैं। इसका मतलब ये है कि पुलिस, प्रशासन, रेग्यूलेटरी नेटवर्क सभी अपनी-अपनी जवाबदेही में विफल हो रही हैं क्योंकि नीचे से लेकर ऊपर तक फर्जीवाड़ा है जो बेरोक-टोक चल रहा है। 

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