आजादी के बाद मोदी जी का पहला रिकॉर्ड

मुंबई– इस बात में दो राय नहीं है कि प्रोटोकॉल का पालन आपने अगर नहीं किया तो आप गुस्से के शिकार हो सकते हैं। चाहे वे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हों या फिर पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव हों, नतीजा भुगतान पड़ेगा। हालांकि आजादी के बाद यह पहली बार हुआ है, जब किसी राज्य के मुख्य सचिव को इस तरह से वापस केंद्र में इसलिए बुला लिया गया हो कि वह प्रधानमंत्री की मीटिंग में देरी से पहुंचा हो।  

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और भाजपा तथा प्रधानमंत्री के बीच नाराजगी बहुत पहले से है। हाल के विधानसभा चुनावों ने इस नाराजगी में आग मेँ और ज्यादा घी डालने का काम किया। भाजपा ने अब तक के अपने सारे हथकंडे तो अपनाए ही और सबसे ज्यादा उसने पहली बार किसी चुनाव में इतनी मेहनत की। हालांकि यह जगजाहिर था कि भाजपा सत्ता तक तो नहीं पहुंचेगी, पर सीटों की बढ़त उसे जरूर मिलेगी और उसे एक जमीन भी मिल गई।  

खैर, चुनाव खत्म हुए, उसके बाद से तनाव और बढ़ गए। लगातार भाजपा के नेताओं का पश्चिम बंगाल में दौरा और फिर राज्यपाल के साथ ममता का विवाद जारी रहा। नए विवाद में प्रधानमंत्री ने जब पश्चिम बंगाल में ममता के साथ तूफान का जायजा लेने के लिए मीटिंग बुलाई तो ममता आधे घंटे देरी से पहुंचीं। उनके साथ उनके चीफ सेक्रेटरी भी थे।  

ममता तो अपना हिसाब किताब कर चली गईं, लेकिन चीफ सेक्रेटरी बेचारे फंस गए। जैसे ही मीटिंग खत्म हुई, मामला दिल्ली पहुंच गया। आनन फानन में प्रमोशन और ट्रेनिंग विभाग ने 48 घंटों में मुख्य सचिव को दिल्ली तलब कर रिपोर्टिंग का फरमान सुना दिया। तमाम कानूनों का हवाला देते हुए उन्हें कहा गया कि वे तुरंत दिल्ली रिपोर्टिंग करें।  

दरअसल आपका बड़पप्न तभी तक अच्छा है, जब तक आप इस तरह से किसी बदले की भावना से काम न करें। क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात। प्रधानमंत्री पद की गरिमा और अपने आप को बड़ा साबित करने के लिए इसकी जरूरत ही नहीं थी। आप तो खुद पूरी दुनिया जानती है कि कितने ऊपर हैं। 130 करोड़ की आबादी के आप मालिक हैं। लेकिन इस तरह की बदले की भावना से इस पद की गरिमा को ठेस पहुंचता है।  

हो सकता है मुख्य सचिव ने जान बूझकर देरी को हो, या ममता के साथ आने में देरी की हो, गलती हो सकती है, लेकिन ऐसी गलतियों का क्या, जिसमें किसी का नुकसान न हो। अगर आप इसे इस तरह से न करते तो पूरा देश आपको कहता आप महान हैं। लेकिन आपने वही किया, जो दूसरे लोग करते हैं। एक IAS अफसर, स्टेट कैडर अलॉट होने के बाद राज्य के अधीन काम करता है l बिना राज्य की सहमति के IAS को केंद्र में ट्रांसफर करना अनियमित है,बिना राज्य द्वारा कार्यमुक्त किये वह दिल्ली नहीं जा सकता l बंगाल के मुख्य सचिव को बिना राज्य की सहमति,दिल्ली ट्रांसफर करना Highhandedness है l 

पिछले 74 साल की आजादी की बात करें तो किसी भी राज्य के मुख्य सचिव को इस तरह के मामले में तो तुरंत तलब नहीं किया गया है। देश की नौकरशाही, देश के सिस्टम और देश की संवैधानिक संस्थाओं पर इस तरह की तानाशाही सही नहीं है। अगर नौकरशाही के साथ इस तरह का व्यवहार होगा तो वो सही नहीं होगा। आपने इससे पहले भी यही किया है। आप ही ने कहा कि कोई जरूरी नहीं कि आईएएस ही देश चलाएंगे। लेकिन हकीकत यही है कि वे देश की सर्वोच्च परीक्षा पास कर के आते हैं। कुछ तो उनमें काबिलियत होगी। आप पांच साल के लिए हैं, पर वो 35-40 साल के लिए हैं।  

उत्तर प्रदेश में जिस तरह से अमिताभ ठाकुर सहित कई अधिकारियों को जबरिया रिटायर करा दिया गया, यह भी तानाशाही का एक उदाहरण है। अगर पांचवीं पास, दसवीं पास मंत्री और विधायक बन सकता है तो क्या जिसने देश की सर्वोच्च परीक्षा पास की, वो अपना काम नहीं कर पाएगा? कब तक आखिर पांचवीं और दसवीं पास के नेताओं के हाथ में यह सर्वोच्च परीक्षा पास करने वाला खेलता रहेगा? मामूली सा नगरसेवक और पंचायत सदस्य भी अधिकारियों को इसी तरह से गाली दे देता है। बस इसलिए कि उनके आका मंत्री और विधायक हैं।  

अगर किसी देश को चलाना है और सिस्टम को सही रखना है तो इस तरह से नौकरशाही के साथ खिलवाड़ मत कीजिए। आप याद कीजिए, जब आप गुजरात के मुख्यमंत्री थे, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी थे। उन्होंने नेशनल इंटीग्रेशन काउंसिल यानी एनआईसी की मीटिंग बुलाई थी। 2013 का मामला है। इसमें कम्युनिकल हारमोनी को प्रमोट करने के लिए मीटिंग बुलाई गई थी।सोशल नेटवर्किंग साइटस की भूमिका पर मीटिंग थी। पर आपने इसी मीटिंग को छोड़ दिया था।  

तब प्रधानमंत्री ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। दरअसल किसी भी पद की गरिमा तब होती है, जब उस पद पर बैठना वाला विनम्र हो, लोगों के लिए हो, न कि इस तरह से बदले की कार्रवाई की भावना से काम करे। हो सकता है कि मुख्य सचिव ने गलती की हो, लेकिन आप के लिए माननीय प्रधानमंत्री जी, यह बात शोभा नहीं देती है।  

याद कीजिए आप, 2014 में जब लोकसभा चुनाव शुरू हुए, पूरे देश ने आपको सर आंखों पर बिठा लिया। वो इसी उम्मीद में कि आप देश को बदलने में और नई सदी के देश को बनाने में एक बेहतरीन प्रशासक साबित होंगे। 2019 में इसी देश ने 2014 की तुलना में आपको और ताकत दिया। आप 130 करोड़ की आबादी के मालिक हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि जिस पेट्रोल और डीजल को लेकर आपने आंदोलन किया, आपने कहा दिल्ली सरकार की नाकामी है, क्या आज आपको नहीं लगता है कि आपकी नाकामी है? मनमोहन सिंह की उम्र से ज्यादा पेट्रोल की कीमत होने पर बहुत तंज कसे गए थे। आज हमें शर्म आनी चाहिए कि हम एक लीटर पेट्रोल 100 रुपए में खरीद रहे हैं। खासकर तब जब कच्चे तेलों की कीमतें कम हैं।  

याद कीजिए प्रधानमंत्री जी, जिस प्याज की कीमतों पर आपने दिल्ली सरकार को नाकाम बताया, वही प्याज आज भी 60-70 रुपए तक बिकती है। वही सरसों का तेल अब 200 रुपए लीटर बिक रहा है। याद कीजिए, जितनी मौतें पिछले 15 महीनों में हुई, जिस तरह से लाशें बिछी हैं, जिस तरह से लोगों को इलाज के लिए सुविधा नहीं है, क्या आप पिछले 15 महीनों में इस पर कुछनहीं कर सकते? यह देश आपको बहुत उम्मीदों के साथ दो बार लाया, 10 साल दिया, लेकिन अगर आज चुनाव हो जाए तो शायद देश आपको उस उम्मीदों के साथ नहीं लाएगा।  

प्रधानमंत्री जी, आपसे अपील है कि कृपया संस्थानों, नौकरशाहों और कानूनी और संवैधानिक रूप से देश को चलाने में आप महारत हासिल करें। न कि इस तरह की गतिविधियों से देश को शर्मसार करें। आपके पद के लिए इस तरह के कदम शोभा नहीं देते हैं। आप सर्वोपरि हैं। आप जिम्मेदार हैं। आपको गलतियों को भुलाकर आगे जाने की जिद होनी चाहिए। देश आपके साथ है।  

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