इस बीमारी से मरे थे 5 करोड़ लोग, अभी तक नहीं पता चला कहां से शुरू हुई थी बीमारी

मुंबई– दुनिया आज कोरोना वायरस से लड़ रही है। भारत जैसा विशाल देश भी लड़खड़ाते हुए इससे जूझ रहा है। मगर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। करीब 104 साल पहले भी स्पेनिश फ्लू नाम की महामारी ने दुनिया में इतने लोगों की जान ले ली कि आज तक उनकी सही गिनती नहीं हो सकी है। 

तब दुनिया की आबादी करीब 180 करोड़ थी। दो साल के भीतर इनमें से करीब 60 करोड़ लोग वायरस की चपेट में आ गए। यानी दुनिया का हर तीसरा शख्स स्पेनिश फ्लू से बीमार हुआ था। अलग-अलग अनुमानों के मुताबिक 1.74 करोड़ से 5 करोड़ लोगों को जान गंवानी पड़ी। दुनिया में आज की आबादी से तुलना करें यह करीब 20 करोड़ लोगों की मौत के बराबर है। 

भारत में स्पेनिश फ्लू को बॉम्बे फ्लू या बॉम्बे फीवर के नाम से जाना गया। इससे 1 करोड़ से लेकर 2 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। यह किसी एक देश में स्पेनिश फ्लू से मरने वालों की सबसे ज्यादा संख्या थी। 1918 के आखिरी तीन महीने सबसे ज्यादा जानलेवा थे। माना जाता है कि पहले विश्वयुद्ध के दौरान सैनिकों की आवाजाही की वजह से फ्लू के वायरस में हुए म्यूटेशन के चलते ऐसा हुआ। स्पेनिश फ्लू से संक्रमित होने और जान गंवाने के 80% मामले इन्हीं तीन महीनों के दौरान हुए। 

104 साल पहले फैले स्पेनिश फ्लू यानी H1N1 इंफ्लूएंजा वायरस से फैली महामारी की पुष्टि के लिए तब RT-PCR या रैपिड एंटीजेन टेस्ट जैसी कोई जांच उपलब्ध नहीं थी। तब न ही रेमडेसिविर जैसी कोई एंटी वायरल दवा थी। क्रिटिकल केयर के लिए मैकनिकल वैंटिलेटर भी नहीं थे। वायरल इंफेक्शन के बाद होने वाले सेकंडरी बैक्टीरियल इंफेक्शन के इलाज के लिए तब कोई एंटीबायोटिक दवा भी नहीं थी। पहली एंटीबायोटिक पेनिसिलीन की खोज 10 साल बाद हुई थी। स्पेनिश फ्लू से बचने के लिए तब कोई वैक्सीन भी नहीं थी। अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के रिसर्चर थॉमस फ्रांसिस और जोनल साल्क ने सेना की मदद से 1940 में फ्लू की पहली वैक्सीन बनाई थी। 

तब डॉक्टरों को यह भी नहीं था कि यह बीमारी वायरस से फैलती है बैक्टेरिया से नहीं। विल्सन स्मिथ, क्रिस्टोफर एंट्रीयूज और पैट्रिक लेडलॉ ने 1933 में पहली बार इन्फ्यूएंजा वायरस को आइसोलेट किया। एंटीवायरल और एंटीबायोटिक दवाएं न होने के कारण तब एस्पिरिन, कुनाइन, अमोनिया, टरपेंटाइन, नमकीन पानी, बाम आदि से किया जाता था। 

20वीं सदी की सबसे बड़ी महामारी का नाम भले ही स्पेनिश फ्लू था, मगर स्पेन से शुरू नहीं थी। दरअसल, तब पूरा यूरोप पहले विश्वयुद्ध में उलझा था। स्पेन अकेला ऐसा प्रमुख यूरोपीय देश था जो इस दौरान तटस्थ था। युद्ध कर रहे दोनों खेमे, अलाइड और सेंट्रल पावर के देशों में फ्लू की खबरों को सेंसर कर दिया गया ताकि सैनिकों का जोश बना रहे।

वहीं, स्पेन का मीडिया स्वतंत्र था। मई 1918 में महामारी की खबर मेड्रिड में सुर्खी बनी। ब्लैक आउट से गुजर रहे देशों में स्पेन के अखबारों में छप रही खबरों से ही महामारी का पता चल रहा था, इसलिए ही इसे स्पेनिश फ्लू कहा जाने लगा। उधर. स्पेन के लोगों का मानना था कि वायरस फ्रांस से फैला है, इसलिए वे इसे फ्रेंच फ्लू कहते थे। 

स्पेनिश फ्लू कहां से शुरू हुआ? अब तक इसका कोई मजबूत जवाब नहीं मिला है। अलग-अलग दावों के मुताबिक फ्रांस, चीन और ब्रिटेन के अलावा अमेरिका को भी इसका जन्मस्थान माना जाता है। हां, यह ऐतिहासिक तथ्य कि स्पेनिश फ्लू का पहला मामला अमेरिका के कैनसास प्रांत के फोर्ट राइली की सैन्य छावनी में 04 मार्च, 1918 को मिला था। 

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