प्रधानमंत्री की आवाज में बात कर एसबीआई से ठगा था 60 लाख रुपए, कोर्ट ने 3 दिन में ही सजा सुना दी

मुंबई– भारत में कोर्ट में 20-20 साल मुकदमें चलते हैं। लेकिन एक मुकदमा केवल 3 दिन ही चला और इसी में आरोपी को सजा भी हो गई। यह एक ऐसा आरोपी है जिसने प्रधानमंत्री की आवाज में बात कर एसबीआई से 60 लाख रुपए ठग लिए थे। इस स्कैंडल में उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की आवाज में एक घोटालेबाज भारतीय स्टेट बैंक (SBI) से 60 लाख रुपए ठग लिए थे।  

दिल्ली में करीब 50 साल पहले SBI से 60 लाख रुपये की ठगी हुई, जिसमें नाम पीएम हाउस का आया। टॉप सीक्रेट मिशन के नाम पर यह वारदात हुई, जो अब भी टॉप मिस्ट्री बनी हुई है। पूर्व खुफिया अधिकारी रुस्तम सोहराब नागरवाला ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की आवाज की नकल करके संसद मार्ग स्थित SBI की शाखा को फोन किया और उससे 60 लाख रुपए निकलवा लिए। घोटाला तब सामने आया जब नागरवाला ने पैसा लेने के बाद टैक्सी वाले को ढेर सारे नोट दिए। इसके बाद SBI के हैड कैशियर वेद प्रकाश मल्होत्रा को इस्तीफा देना पड़ा। 

नागरवाला ने रुपए निकलवाने के लिए बहाना किया था कि प्रधानमंत्री ऑफिस के आदेश पर उन्होंने पैसा मांगा है और पैसा बांग्लादेश संकट से निपटने के लिए चाहिए। उस वक्त पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश में मुक्ति संघर्ष जोरों पर था। यह घटना 24 मई, 1971 की है जब सुबह SBI की संसद मार्ग ब्रांच में बैंक के चीफ कैशियर वेद प्रकाश मल्होत्रा के पास एक फोन आया। फोन के दूसरे छोर पर रुस्तम सोहराब नागरवाला ने अपना परिचय देते हुए कहा कि वो प्रधानमंत्री कार्यालय से प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव परमेश्वर नारायण हक्सर बोल रहे हैं। उस समय की रिपोर्ट के मुताबिक, उसने कहा कि प्रधानमंत्री को बांग्लादेश में एक गुप्त अभियान के लिए 60 लाख रुपये चाहिए। 

तभी नागरवाला ने मल्होत्रा से कहा कि लीजिए प्रधानमंत्री से ही बात कर लीजिए। इसके कुछ सेकंडों बाद एक महिला ने मल्होत्रा से कहा कि आप ये रुपये लेकर खुद बाइबिल भवन पर आइए। वहां एक शख्स आपसे मिलेगा और एक कोड कहेगा, बांग्लादेश का बाबू. आपको इसके जवाब में कहना होगा बार एट लॉ। इसके बाद आप वो पैसे उनके हवाले कर दीजिएगा और इस मामले को पूरी तरह से गुप्त रखिएगा। 

इसके बाद मल्होत्रा ने आदेश का पालन करते हुए उप मुख्य कैशियर राम प्रकाश बत्रा से एक कैश बॉक्स में 60 लाख रुपये रखने के लिए कहा। इसके बाद दो चपरासियों ने उस कैश ट्रंक को बैंक की गाड़ी में लोड किया और मल्होत्रा खुद उसे चलाकर बाइबल हाउस के पास ले गए। कार के रुकने के बाद एक शख्स ने आकर वो कोड वर्ड उनके सामने बोला। फिर वो शख्स बैंक की ही कार में बैठ गया और मल्होत्रा और वो सरदार पटेल मार्ग और पंचशील मार्ग के जंक्शन के टैक्सी स्टैंड पर पहुंचे। 

वहां पर उस व्यक्ति ने वो ट्रंक उतारा और मल्होत्रा से कहा कि वो प्रधानमंत्री निवास पर जा कर इस रकम का वाउचर ले लें। मल्होत्रा जब पीएम हाउस पहुंचे तो पता चला कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तो संसद में हैं, फिर वो संसद पहुंचे तो पीएम से तो मुलाकात नहीं हुई लेकिन स्टाफ ने पीएन हक्सर से बात करवाई। हक्सर यह सुनकर चौंक गए और बताया कि उन्होंने ऐसा कोई फोन नहीं किया, आप जाकर पुलिस में FIR करवाओ। इसके बाद मल्होत्रा घबरा गए और जाकर FIR दर्ज करवाई। 

बाद में पता चला कि उस शख्स का नाम रुस्तम सोहराब नागरवाला है। नागरवाला कुछ समय पहले भारतीय सेना में कैप्टन के पद पर काम कर रहा था और उस समय भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के लिए काम कर रहा था। बाद में पुलिस हरकत में आ गई और उसने रात करीब पौने 10 बजे नागरवाला को दिल्ली गेट के पास पारसी धर्मशाला से गिरफ्तार कर लिया और डिफेंस कॉलोनी में उसके एक मित्र के घर से 59 लाख 95 हजार रुपये बरामद कर लिए। इस पूरे अभियान को ऑपरेशन तूफान (Operation Toofan) का नाम दिया गया। 

सिर्फ 10 मिनट की सुनवाई के बाद सैशन कोर्ट ने नागरवाला को चार साल की सजा और एक हजार रुपए के जुर्माने की सजा सुना दी। 27 मई, 1971 को नागरवाला ने अदालत में अपना जुर्म कबूल कर लिया था। उसी दिन पुलिस ने न्यायिक मजिस्ट्रेट के पी खन्ना की अदालत में नागरवाला के खिलाफ मुकदमा दायर किया और शायद भारत के न्यायिक इतिहास में ये पहली बार हुआ था कि किसी आरोपी को गिरफ्तार किए जाने के तीन दिन के अंदर ही उस पर मुकदमा चला कर सजा भी सुना दी गई, लेकिन इस घटना की तह तक कोई नहीं पहुंच पाया। फरवरी 1972 के शुरू में नागरवाला को तिहाड़ जेल के अस्पताल में भर्ती किया गया और वहां से उसे 21 फरवरी को जी बी पंत अस्पताल ले जाया गया जहां दो मार्च को उसकी तबियत खराब हो गई। दिल का दौरा पड़ने से नागरवाला की मौत हो गई।  

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