बैंकों ने 9 महीनों में 1.15 लाख करोड़ रुपए के कर्ज को राइट ऑफ किया

मुंबई-चालू वित्त वर्ष में बैंकों ने दिसंबर तिमाही तक 1.15 लाख करोड़ रुपए के कर्ज को राइट ऑफ किया है। यह जानकारी बजट सत्र में वित्त राज्य मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर ने लोकसभा में दी।  

ठाकुर ने कहा कि ये राइट ऑफ वाले लोन लगातार कर्ज देने के लिए बाध्य रहेंगे और बैंक रिकवरी की प्रक्रिया को जारी रखेगा। राइट ऑफ से कर्जदार को कोई फायदा नहीं होगा। रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक कमर्शियल बैंकों ने 2018-19 में 2.36 लाख करोड़ रुपए, 2019-20 में 2.34 लाख करोड़ रुपए और 2020-21 के पहले 9 महीनों में 1.15 लाख करोड़ रुपए के कर्ज को राइट ऑफ किया है।  

ठाकुर ने कहा कि बैंकों के कर्ज के लिए ढेर सारे तंत्र बनाए गए हैं। इसमें सिविल कोर्ट में सूट फाइल करना, डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल में जाना और नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में जाने जैसे रास्ते बैंकों के पास हैं। पिछले दो वित्त वर्षों और इस साल के पहले 9 महीनों में कमर्शियल बैंकों ने 3.68 लाख करोड़ रुपए का लोन रिकवर किया है। इसमें से राइट ऑफ का 68 हजार 219 करोड़ रुपए है। बैंकों के बुरे फंसे कर्ज यानी NPA में कमी आई है। यह 31 दिसंबर 2020 तक 2.79 लाख करोड़ रुपए कम होकर 7.56 लाख करोड रुपए पर आ गया है।  

ठाकुर ने कहा कि ढेर सारे कदम ऐसे उठाए गए हैं जिनसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अवैध तरीके से दिए जाने वाले लोन पर रोक लगे। इस तरह के कारोबार को रोकने के लिए 27 लोन देने वाले ऐप्स को ब्लॉक कर दिया गया है। इसी के साथ उन्होंने कहा कि अभी ऐसी कोई योजना नहीं है कि बैंकों में हफ्ते में पांच दिनों का काम होगा।  

सबसे ज्यादा राइट ऑफ देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने किया है। इसने वित्त वर्ष 2020 में 52 हजार 362 करोड़ रुपए के कर्ज को राइट ऑफ किया है। निजी बैंकों में सबसे ज्यादा कर्ज का राइट ऑफ ICICI बैंक ने किया है। इसने 10 हजार 942 करोड़ रुपए का कर्ज राइट ऑफ किया है। रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, बैंकों का कुल बुरा फंसा कर्ज (ग्रॉस NPA) मार्च 2019 में 9.1% था जो मार्च 2020 में 8.2% रहा है। इसमें से ज्यादातर योगदान इसी तरह के राइट ऑफ का रहा है।  

नियमों के मुताबिक उन कर्जों को राइट ऑफ किया जाता है जो रिजर्व बैंक की नीतियों और बैंक के बोर्ड द्वारा मंजूर नीतियां हैं। ये वे लोन होते हैं जो एनपीए होते हैं और जिनकी पूरी प्रोविजनिंग होती है और जो चार साल के हो जाते हैं। ऐसे लोन को बैलेंसशीट से बाहर कर दिया जाता है। बैंक इसके बाद इसको देखते रहते हैं और वसूली की कोशिश करते हैँ।  

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