बीयर कंपनियों में मिलकर सांठ-गांठ की, कीमतों को बढ़ाकर रखा

मुंबई– बीयर के कारोबार में शामिल तीन कंपनियों पर भारी-भरकम पेनाल्टी लग सकती है। खबर है कि इन तीन कंपनियों कार्ल्सबर्ग, सबमिलर और भारत की यूनाइटेड ब्रेवरीज (UB) ने सांठ-गांठ कर बीयर की कीमतों को हमेशा ऊपर रखा। इसी मामले में यह पेनाल्टी लगने वाली है। तीनों कंपनियों ने एक दूसरे को बिजनेस से जुड़े संवेदनशील सूचनाओं का आदान-प्रदान किया। 11 वर्षों में भारत में बीयर की कीमतें तय करने के लिए सांठगांठ की। 2018 में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने तीनों कंपनियों के दफ्तर पर छापा मारा और जांच शुरू की थी।  

पाया गया है कि भारत के 7 अरब डॉलर के बीयर मार्केट में इनकी हिस्सेदारी 88% है। CCI के वरिष्ठ सदस्य मार्च में तैयार की गई रिपोर्ट पर विचार करेंगे। क्योंकि वे जुर्माने पर फैसला लेंगे जो 25 करोड़ डॉलर से अधिक हो सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, कम से तीन बार अधिकारियों ने एक-दूसरे से अपनी योजनाओं को गुप्त रखने की अपील की।  संदेशों का आदान-प्रदान किया। AIBA के महानिदेशक ने तीनों कंपनियों के अधिकारियों को 2016 में एक ई-मेल में लिखा कि हमें पकड़े जाने से बचना चाहिए।  

रिपोर्ट में अधिकारियों की बातचीत, वॉट्सऐप के मैसेज और ई-मेल शामिल हैं। इसमें बताया गया है कि इन कंपनियों ने नियमित और सामूहिक रूप से सॉठ-गांठ कर कई राज्यों में कीमत बढ़ाने की रणनीति बनाई। CCI रिपोर्ट में पाया गया कि कंपनियों ने कीमतों पर सामूहिक रूप से निर्णय लेने के लिए ऑल इंडिया ब्रूयर्स एसोसिएशन (AIBA) को एक प्लेटफॉर्म के रूप में भी इस्तेमाल किया। लोकल ग्रुप्स ने तो मूल्य वृद्धि के लिए इन कंपनियों की ओर से पैरवी भी की।  

248 पेज की CCI रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी मशीनरी में हेर फेर करने के लिए ये शराब बनाने वाले अच्छी तरह से जानते थे कि AIBA के माध्यम से उनका कलेक्टिव अप्रोच प्रतिस्पर्धा कानून (competition law) का उल्लंघन कर रहा था। रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया कि यह गिरोह (कॉर्टेल) 2007 और अक्टूबर 2018 के बीच काम कर रहा था। यूनाइटेड ब्रुअरीज के हेनकेन के मालिक ने कहा कि इसने अधिकारियों को सहयोग दिया था और CCI के समक्ष अपनी बात को रखेगा। 

सबसे बड़ी शराब बनानेवाली कंपनी Anheuser-Busch InBev ने 2016 में सबमिलर को खरीदा था। इसने कहा कि यह एंटीट्रस्ट कानून का पालन बहुत गंभीरता से करता है। 2018 में CCI के छापे में लैपटॉप, पेन ड्राइव और स्मार्टफोन से सैकड़ों फाइलें जब्त की गई थी। यह मामला तब शुरू हुआ जब एबी इनबेव ने CCI के लीनिएंसी प्रोग्राम का इस्तेमाल कर यह खुलासा किया कि उसने भारत में सबमिलर के ऑपरेशंस को इंटीग्रेटेड करते हुए एक कॉर्टेल का पता लगाया था।  

CCI की जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि इस मामले में 19 बीयर अधिकारी प्रतिस्पर्धी प्रथाओं (anticompetitive practices) में लगे हुए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि ज्यादातर इन कंपनियों में मिलीभगत टॉप मैनेजमेंट के माध्यम से की गई है। इसमें मैनेजिंग डायरेक्टर, वाइस प्रेसिडेंट और सेल्स एंड मार्केटिंग प्रमुख शामिल हैं।  

जब CCI ने कार्ल्सबर्ग इंडिया के पूर्व प्रबंध निदेशक माइकल जेंसेन से पूछा कि क्या कंपनी मूल्य तय करने के मुद्दों पर अपने प्रतिस्पर्धियों के साथ सक्रिय रूप से कोऑर्डिनेशन कर रही है और अत्यंत सावधानी बरत रही है ताकि कोई दस्तावेजी सबूत न छोड़ें? तो उनका जवाब हां में था। रिपोर्ट में कहा गया है कि वॉट्सऐप पर कुछ चर्चाएं हुईं। रिपोर्ट से पता चलता है कि 2013 में यूबी के चीफ सेल्स ऑफिसर किरण कुमार और सबमिलर के तब के प्रबंध निदेशक शलभ सेठ ने एक विशेष राज्य में बीयर में 60 रुपए मूल्य वृद्धि की योजना बनाने के लिए वॉट्सऐप संदेशों का आदान-प्रदान किया। 

रिपोर्ट के मुताबिक, सेठ ने एक मैसेज में लिखा है- प्लीज यह संदेश दूसरे दोस्तों तक पहुंचाएं। इससे यह साफ पता चलता है कि यह अधिकारी बाकी दूसरी कंपनियों से कीमत में तालमेल बनाने की कोशिश कर रहे थे। सेठअब यूबी में काम करते हैं। सेठ और कुमार ने अलग बयानों में कहा कि उन्होंने अधिकारियों को “पूर्ण सहयोग” दिया था और अपनी बात CCI को बताएंगे।  

जांच में कहा गया है कि बीयर कंपनियों ने ऑर्टिफिशियल शॉर्टेज पैदा किया और साथ ही सरकारों पर दबाव बनाने का काम किया। 2015 से 2018 के बीच कम से तीन बार बातचीत की थी। भारत के एंटीट्रस्ट कानून में कहा गया है कि इस तरह के समझौते प्रतिस्पर्धी विरोधी (anti-competitive) हैं। कार्ल्सबर्ग ने सीसीआई को बताया कि 2015 में ओडिशा में मूल्य निर्धारण नीति में बदलाव के बाद सभी कंपनियों ने बीयर की आपूर्ति को सीमित करने का फैसला किया।  

2018 के शुरुआत में कार्ल्सबर्ग द्वारा महाराष्ट्र में तैनात नीलेश पटेल को भेजा गया एक इंटरनल ई-मेल इसी रणनीति की ओर इशारा करता है। पटेल ने लिखा कि 2017 में राज्य की बिक्री में गिरावट के पीछे मुख्य रूप से यूबी और कार्ल्सबर्ग द्वारा सयुंक्त रूप से लिया गया वह फैसला था जिसके तहत उत्पाद शुल्क (एक्साइज) बढ़ने के बाद मार्केट को भूखा रखने की बात कही गई थी। 

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